अगले हफ्ते 8 अरब हो जाएगी दुनिया की आबादी। जानें क्या होगा इसका असर

 
8 billion human population

सिर्फ 6 दिन और। उसके बाद इंसानों की आबादी 800 करोड़ पार हो जाएगी। क्या पृथ्वी पर इंसानों की संख्या बहुत ज्यादा हो रही है? इतने ज्यादा इंसानों का बोझ संभाल पाएगी हमारी धरती? एक्सपर्ट्स को ज्यादा आबादी से दिक्कत नहीं है। समस्या आ रही है अधिक खपत से। सवाल ये है कि इस जनसंख्या से पृथ्वी का क्या होगा?

 

नई दिल्ली। हमलोग यानी इंसान। वैज्ञानिक भाषा में होमो सेपियंस। इंसान आबादी बढ़ाने में एक्सपर्ट हैं। 100 करोड़ से 200 करोड़ तक पहुंचने में 125 साल लगे। लेकिन 700 से 800 करोड़ पहुंचने में सिर्फ 12 साल। 15 नवंबर 2022 को दुनिया भर में इंसानों की आबादी 800 करोड़ पार कर जाएगी। संयुक्त राष्ट्र इस सतत विकास का श्रेय विज्ञान, तकनीकी, इनोवेशन, लंबी उम्र और सेहतमंद जीवन को दे रहा है। 

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इंसानों की आबादी के बढ़ने का दर पिछले कुछ दशकों से गिरा है। लेकिन इसके बावजूद 2037 तक हमारी आबादी 900 करोड़ और 2058 तक 1000 करोड़ हो जाएगी। यह अनुमान UN DESA की वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉसपेक्ट्स 2022 की रिपोर्ट में लगाया गया है। संयुक्त राष्ट्र के पापुलेशन फंड की प्रमुख नटालिया कानेम ने कहा कि यह इंसानियत के इतिहास में मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। क्योंकि अब मांओं और बच्चों की मौत कम होती है। 

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नटालिया कहती हैं कि मुझे इंसानों की बढ़ती संख्या से कोई डर नहीं है। डर इस बात का है कि इससे संसाधनों की खपत तेजी से बढ़ेगी। चिंता इस बात की सभी देशों को करनी चाहिए। खासतौर से उन देशों को जहां पर प्रजनन दर ज्यादा हैं। कई लोग इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते। रॉकफेलर यूनवर्सिटी की लेबोरेटरी ऑफ पॉपुलेशन के जोएल कोहेन कहते हैं कि क्या मैं धरती पर अतिरिक्त हूं? धरती हम इंसानों का बोझ कैसे सहेगी। इसके दो पक्ष हैं- पहला प्राकृतिक सीमाएं और इंसानों के पास मौजूद विकल्प। 

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जितना ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों की खपत होगी, मुश्किल उतनी ज्यादा
जोएल कहते हैं कि हमारे विकल्प यह तय करेंगे कि इंसान कितना ज्यादा जैविक स्रोतों का इस्तेमाल करता है। जैसे जमीन, जल और जंगल। अगर पृथ्वी इन चीजों को लगातार हर साल तेज गति में पैदा करती रहे तो इंसान इनका इस्तेमाल या खपत कर सकते हैं। लेकिन खपत ज्यादा हुई और पृथ्वी इन्हें सही समय पर पैदा या संरक्षित नहीं कर पाई तो मुश्किल आएगी। जमीन के लिए जंगल कटेंगे। जंगल कटने से जल में कमी आएगी। नतीजा प्राकृतिक आपदाएं। 

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इंसानों की फितरत है- लालच और बेवकूफी पूर्ण हरकतें करना
जोएल कहते हैं कि इंसानों की फितरत में बेवकूफीपूर्ण हरकतें करने और लालच की बुरी आदत है। ज्यादा ईंधन के लिए जीवाश्म ईंधन का दुरुपयोग होगा। नतीजा ये कि कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन ज्यादा होगा। इसकी वजह से धरती पर ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ेगी। ग्लेशियर पिघलेंगे। समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा। जमीन समुद्र में समाएगी। मौसम बदलेगा। गर्मी ज्यादा पड़ेगी। बेमौसम बारिश होगी। सर्दियां छोटी या लंबी हो सकती है। 

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बढ़ती आबादी के हिसाब से इंसानों को चाहिए 1.75 धरती
WWF और ग्लोबल फुटप्रिंट नेटवर्क के मुताबिक जिस गति से इंसानों की आबादी बढ़ रही है, उस हिसाब से हमारी धरती कम पड़ जाएगी। इंसानों की जरुरतों को पूरा करने के लिए 1.75 धरती और चाहिए। यानी जितनी अभी है उसमें 75 फीसदी की और बढ़ोतरी होनी चाहिए। अब ऐसा तो हो नहीं सकता। हाल ही में आई संयुक्त राष्ट्र की क्लाइमेट रिपोर्ट के मुताबिक बढ़ते हुए ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की बड़ी वजह बढ़ती आबादी है। जबकि, बढ़ती आबादी आर्थिक विकास में कम मदद कर रही है। जोएल कोहेन कहते हैं कि हम इंसानों को भविष्य देखना नहीं आता। 

आबादी का असर सभी प्रकार की सुविधाओं और संसाधनों पर सीधे तौर पर पड़ेगा. (फोटोः गेटी)

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सबसे ज्यादा आबादी इन आठ देशों में बढ़ेगी, जिसे रोक नहीं सकते
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया के जिन आठ देशों में सबसे तेजी से आबादी बढ़ेगी, वो हैं- कॉन्गो, मिस्र, इथियोपिया, भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, फिलिपींस और तंजानिया। 2050 तक जो भी जनसंख्या बढ़ रही है, उसमें आधे से ज्यादा योगदान अफ्रीका के सब-सहारन देशों का रहेगा। ऐसा नहीं है कि भारत पीछे रहेगा इस मामले में। अच्छी बात ये है कि अगर दुनिया में हर कोई भारतीय नागरिक की तरह रहे तो उसे हर साल सिर्फ 0.8 धरती की जरुरत पड़े। लेकिन अमेरिकी नागरिक की तरह रहेगा तो उसे साल में पांच पृथ्वी की जरुरत होगी। यानी भारत में संसाधनों का इस्तेमाल कम हो रहा है अमेरिका की तुलना में। 

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