पाकिस्तान को चीन ने फिर बनाया बेवकूफ, ग्वादर पोर्ट से स्थानीय लोगों का कोई भला नहीं

 
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ग्वादर में एक सामाजिक कार्यकर्ता नासिर रहीम सुहराबी ने कहा, "ग्वादर में युवाओं की यह पीढ़ी पिछले 20 वर्षों में इस सपने के साथ बड़ी हुई है कि चीनी पैसा ग्वादर को एक नए दुबई या सिंगापुर में बदल देगा।"

 

इस्लामाबाद। आर्थिक कंगाली से जूझ रहे पाकिस्तान को चीन ने एक बार फिर से बेवकूफ बना दिया है। दरअसल पाकिस्तान में चीन द्वारा वित्त पोषित ग्वादर बंदरगाह ने आर्थिक क्रांति का वादा किया था। पाकिस्तान सरकार को उम्मीद थी की ग्वादर बंदरगाह चीन को सौंप देने से उसके स्थानीय लोगों का भला होगा और उन्हें आर्थिक रूप से मदद मिलेगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यह एक अलग तरह का बंदरगाह समझौता बनकर रह गया है, जिसका आर्थिक लाभ स्थानीय आबादी को नहीं मिल रहा है। न्यूयॉर्क स्थित समाचार वेबसाइट द चाइना प्रोजेक्ट ने अपनी रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है। 

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ग्वादर बंदरगाह के डेवलपमेंट को लेकर पिछले सात साल से काम चल रहा है। चीन इसमें पैसे लगा रहा है। लेकिन इस क्षेत्र के निवासियों को इससे कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। यही नहीं, लोगों को उम्मीद थी कि बंदरगाह के बनने से आसपास के इलाके में विकास होगा लेकिन ऐसा भी नहीं हुआ है। सारे विकास कार्य बंदरगाह तक सीमित होकर रह गए हैं।

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ग्वादर में एक सामाजिक कार्यकर्ता नासिर रहीम सुहराबी ने कहा, "ग्वादर में युवाओं की यह पीढ़ी पिछले 20 वर्षों में इस सपने के साथ बड़ी हुई है कि चीनी पैसा ग्वादर को एक नए दुबई या सिंगापुर में बदल देगा। लेकिन आज वे जो देखते हैं वह उनके सपनों को तोड़ने के लिए काफी है।" सुहराबी ने आगे कहा कि पूरा शहर एक सुरक्षा घेरे में है। स्थानीय लोगों को बंदरगाह शहर में जाने के लिए प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है नहीं को भारी सुरक्षा जांच से गुजरना पड़ता है। 

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यहां का मिनी फिश हार्बर अब ग्वादर पोर्ट का एक हिस्सा बन गया है। पहले इस जगह से स्थानीय मछुआरे मछलियां पकड़ते थे लेकिन अब वे बंदरगाह तक फ्री में नहीं पहुंच सकते क्योंकि उन्हें सुरक्षा प्रोटोकॉल से गुजरना पड़ता है। कोह-ए-बातिल, ग्वादर पोर्ट के ठीक दक्षिण में एक पहाड़ी इलाका है। यहां के बीच पर खूब लोग आते थे। सुहराबी ने कहा, "निर्माण कार्य शुरू होने से पहले यह स्थानीय आगंतुकों के मनोरंजन का स्थान हुआ करता था। अब वे विभिन्न सुरक्षा चौकियों से गुजरे बिना क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकते।"

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राजनीतिक कार्यकर्ता यह भी दावा करते हैं कि जिस तरह से बंदरगाह शहर विकसित किया जा रहा है, वह स्थानीय लोगों को नुकसान पहुंचाएगा। ग्वादर में एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता कलसूम बलूच ने कहा कि बंदरगाह के विकास के साथ समस्याएं और बढ़ गई हैं। उन्होंने आगे कहा कि स्थानीय लोग "चिंतित" हैं। बंदरगाह का निर्माण करते समय, प्रारंभिक योजना स्थानीय लोगों को शिफ्ट करने की थी लेकिन ग्वादर बंदरगाह प्राधिकरण (जीपीए) के अध्यक्ष ने इस साल सितंबर तक कहा कि वे उन्हें शिफ्ट नहीं कर रहे हैं। 

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स्थानीय लोगों को डर है कि वे "अल्पसंख्यक बन" जाएंगे। उनके डर के बारे में बात करते हुए, नसीर खान कशानी ने कहा कि ये विदेशियों की आमद के कारण "मात्र आशंकाएं" हैं। "यह सच नहीं है।" उन्होंने कहा, "अगर हम पिछले पांच वर्षों में ग्वादर में गैर-स्थानीय और चीनी लोगों के आगमन को देखें, तो इसने ग्वादर की आबादी में नाममात्र की वृद्धि की है, जो अनुमानित रूप से 150,000 है। स्थानीय लोग अभी भी बहुसंख्यक हैं।" उन्होंने यह भी कहा कि वे क्षेत्र को एक बेहतर बुनियादी ढांचा देने के लिए काम कर रहे हैं।

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हालांकि, स्थानीय विश्लेषक इस बात से आश्वस्त नहीं हैं कि चीन के पैसे से बन रहा पोर्ट उनकी शंकाएं नहीं बढ़ाएगा। राजनीतिक विश्लेषक जन मुहम्मद बलूच ने द चाइना प्रोजेक्ट को बताया, "जब पाकिस्तानी अधिकारियों ने बंदरगाह के विकास की योजना बनाई तो ग्वादर के लोगों से सलाह क्यों नहीं ली गई? इससे पता चलता है कि इस्लामाबाद में निर्णय लेने वालों को स्थानीय लोगों की वैध चिंताओं को दूर करने में कोई दिलचस्पी नहीं है।" चीन की सरकार ने परियोजना को "चीनी शहर शेन्जेन से प्रेरित" बताकर प्रचारित किया, लेकिन वास्तविकता इससे कोसों दूर है।

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