Gudi Padwa 2023: यहां जानें गुड़ी पड़वा का शुभ मुहूर्त, परंपराएं और सब कुछ जो आपको जानना चाहिए

गुड़ी पड़वा नाम दो शब्दों से बना है- 'गुड़ी', जिसका अर्थ है भगवान ब्रह्मा का ध्वज या प्रतीक और 'पड़वा' जिसका अर्थ है चंद्रमा के चरण का पहला दिन।
 
Gudi Padwa 2023: यहां जानें गुड़ी पड़वा का शुभ मुहूर्त, परंपराएं और सब कुछ जो आपको जानना चाहिए

नई दिल्ली। गुड़ी पड़वा (Gudi Padwa 2023) या उगादी त्यौहार नए साल की शुरुआत के साथ-साथ दक्षिण भारत में वसंत ऋतु की शुरुआत का जश्न मनाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, हर साल चैत्र महीने के पहले दिन उत्सव मनाया जाता है। गुड़ी पड़वा का पर्व 22 मार्च 2023 को मनाया जाएगा। चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि 21 मार्च 2023 को रात 10 बजकर 52 मिनट से शुरू होकर 22 मार्च 2023 को रात 08 बजकर 20 मिनट पर समाप्त होगी। गुड़ी पड़वा नाम दो शब्दों से बना है- 'गुड़ी', जिसका अर्थ है भगवान ब्रह्मा का ध्वज या प्रतीक और 'पड़वा' जिसका अर्थ है चंद्रमा के चरण का पहला दिन। इस त्योहार के बाद रबी की फसल काटी जाती है क्योंकि यह वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है।

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गुड़ी फहराना निश्चित रूप से त्योहार की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। लोग गुड़ी पर चढ़ने के लिए एक मानव पिरामिड बनाते हैं ताकि नारियल को उठाए जाने के बाद उसके भीतर फोड़ा जा सके। यह एक महत्वपूर्ण उत्सव अनुष्ठान है जो व्यावहारिक रूप से महाराष्ट्र में हर जगह किया जाता है। केवल वयस्क पुरुषों और किशोर लड़कों को ही इस अभ्यास में भाग लेने की अनुमति है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कहा जाता है कि इस दिन भगवान ब्रह्मा ने ब्रह्मांड का निर्माण किया था। यह भी कहा जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने गुड़ी पड़वा के दिन दिनों, हफ्तों, महीनों और वर्षों की अवधारणा को आगे बढ़ाया। त्योहार को दक्षिण भारत में उगादि कहा जाता है और इसे ब्रह्मांड के निर्माण का पहला दिन माना जाता है। इसलिए इस दिन भगवान ब्रह्मा की पूजा की जाती है। 

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गुड़ी पड़वा के साथ ही हिंदू नववर्ष की शुरुआत हो जाती है। गुड़ी पड़वा के त्योहार का उत्साह विशेष रूप से महाराष्ट्र राज्य में देखा जाता है। साथ ही आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में भी यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। गुड़ी का अर्थ होता है विजय पताका। गुड़ी पड़वा के दिन पताका (झंडा) फहराने की परंपरा है। गुड़ी पड़वा के दिन मराठी समुदाय के लोग घर के बाहर गुड़ी बांधकर पूजा करते हैं. इसे सुख-समृद्धि का सूचक माना जाता है।

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गुड़ी पड़वा की कथा गुड़ी पड़वा के उत्सव से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में दक्षिण भारत में राजा बलि राज्य करते थे। जब भगवान श्रीराम माता सीता को रावण से मुक्त कराने के लिए लंका की ओर जा रहे थे। फिर दक्षिण में उनकी भेंट बालि के भाई सुग्रीव से हुई। सुग्रीव ने भगवान श्री राम को बाली के कुशासन और आतंक के बारे में सब कुछ बता दिया। तब भगवान श्रीराम ने बाली का वध कर सुग्रीव को उसके आतंक से मुक्त कराया। कहा जाता है कि जिस दिन भगवान श्री राम ने बाली का वध किया था, वह दिन चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा का दिन था। इसलिए हर साल इस दिन को दक्षिण में गुड़ी पड़वा के रूप में मनाया जाता है और विजय पताका फहराई जाती है। गुड़ी पड़वा पर आज भी झंडा फहराने की परंपरा चली आ रही है।

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