POCSO Act- 2012 के 10 वर्ष पूर्ण होने पर राज्य स्तरीय सेमिनार का आयोजन, एक्ट को अधिक प्रभावी बनाने, पीड़ित को त्वरित राहत दिलाने पर हुआ मंथन

पोक्सो एक्ट और किशोर न्याय में क्या सुधार हो सकते हैं इस पर विचार करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि हर शहर, हर राज्य की अलग-अलग समस्याएं हैं।

 
POCSO Act- 2012 के 10 वर्ष पूर्ण होने पर राज्य स्तरीय सेमिनार का आयोजन, एक्ट को अधिक प्रभावी बनाने, पीड़ित को त्वरित राहत दिलाने पर हुआ मंथन

जयपुर। जूविनाइल जस्टिस कमेटी, राजस्थान उच्च न्यायालय, जयपुर, राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा यूनिसेफ के सहयोग से रविवार को राजस्थान पुलिस अकादमी, जयपुर के सभागार में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम 2012 (पोक्सो एक्ट- 2012) के 10 वर्ष पूर्ण होने पर राज्य स्तरीय श्स्टेट लेवल कंसल्टेशन फॉर इंप्लीमेंटेशन ऑफ पोक्सो एक्ट 2012श् विषयक राज्य स्तरीय सेमिनार का आयोजन किया गया। 

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सेमिनार में बच्चों व किशोरों के हित में लैंगिक अपराधों पर नियंत्रण, पोक्सो एक्ट को और अधिक प्रभावी बनाना, पीड़ित को समय पर चिकित्सा सुविधा, मनोवैज्ञानिक सलाह, प्रतिकर राशि समय पर मिलना, समाज व लोगों की मानसिकता में परिवर्तन जैसे विषयों पर गहन मंथन किया गया। 

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सेमिनार के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए न्यायाधिपति राजस्थान उच्च न्यायालय एवं अध्यक्ष किशोर न्याय समिति विजय विश्नोई ने कहा कि बालकों के सरंक्षण के लिए किशोर न्याय अधिनियम 1986 में बना और इसमें संशोधन भी हुए। पोक्सो एक्ट और किशोर न्याय में क्या सुधार हो सकते हैं इस पर विचार करना जरूरी है। उन्होंने बताया कि हर शहर, हर राज्य की अलग-अलग समस्याएं हैं। अब वक्त आ गया है कि बच्चों को लैंगिक अपराधों व हिंसा के बारे में जागरूक किया जाए। बालकों को तो पता ही नहीं है कि उनके साथ जो व्यवहार हो रहा है वह सही है या गलत। बच्चों की मासूमियत और जागरूकता की कमी के कारण वे यौन शोषण का शिकार होते हैं। बचपन एक प्रकार से खुला मन होता है उस समय की बातें जीवन भर याद रहती हैं। उन्होंने कहा कि कानून बन गए हैं लेकिन इनका क्रियान्वयन कैसे हो, कहां कमियां है हम सबको इस पर विचार करना है। 

विश्नोई ने कहा कि पोक्सो एक्ट में सभी प्रकार के प्रावधान दिए गए हैं, जिससे बच्चों को एक सुरक्षित माहौल मिल सके। उन्होंने कहा हमारा कर्तव्य है कि बच्चों को सुरक्षित व अच्छा माहौल दें। उनके साथ माता-पिता समय बिताएं। सबसे पहले हर व्यक्ति यह संकल्प ले कि वह अपने परिवार में बच्चों को अच्छे संस्कार देंगे, ऐसी शुरुआत करें।

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राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति इंद्रजीत सिंह ने कहा कि 20 नवंबर को हम अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस मना रहे हैं। इस अवसर पर यह संकल्प लेना है कि पोक्सो अधिनियम 2012 को 10 वर्ष पूरे हो गए हैं,  इसलिए आज इस अवसर पर क्या सुधार हो सकते हैं इस पर हमको विचार करना है। बच्चों को गुड टच तथा बैड टच के बारे में जानकारी प्रदान करना हम सभी माता-पिता का कर्तव्य है। बाल पीड़ितों को त्वरित गति से प्रति कर दिलाया जाना भी हमारा कर्तव्य है।

राजस्थान राज्य बाल संरक्षण अधिकार आयोग की अध्यक्ष संगीता बेनीवाल ने कहा कि हम अपराध से आहत बाल पीड़ितों के घावों को तो नहीं भर सकते लेकिन हमारा लक्ष्य 100 प्रतिशत बाल पीड़ितों को एक प्रभावी मेकैनिज्म के जरिए समय पर और उनकी पीड़ा के अनुरूप प्रतिकर दिलाना और उनके पुनर्वास के प्रयास करना है। उन्होंने कहा कि बालक को  आत्मरक्षा का प्रशिक्षण स्कूलों में दिलाया जा रहा है, 1098 चाइल्ड हेल्पलाइन जारी की गई है। सभी के तालमेल से ही हम किसी मिशन को सफल कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि बाल आयोग शिकायत आने पर तुरंत प्रभावी रूप से प्रसंज्ञान लेता है। 

अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक राजीव शर्मा ने लैंगिक हिंसा से पीड़ित बच्चों के बेहतर पुनर्वास, पीड़ित प्रतिकर स्कीम, पॉक्सो केसेस में पुलिस की अहम भूमिका पर प्रकाश डाला।

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स्वागत उद्बोधन में रालसा जयपुर के सदस्य सचिव दिनेश कुमार गुप्ता ने कहा कि यह सेमिनार लैंगिक अपराधों से बालकों के संरक्षण अधिनियम 2012 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य स्तरीय परामर्श के लिए आयोजित की गई है। उन्होंने बताया कि रालसा द्वारा पोक्सो एक्ट के प्रभावी क्रियान्वयन के अनेक प्रयास किए जा रहे हैं और भविष्य में भी नवीन प्रयास किए जाते रहेंगे। 

सेमिनार के उद्घाटन सत्र को चीफ ऑफ यूनिसेफ फील्ड ऑफिस मिस इसाबेल बारडेम, रिसर्च एंनफोल्ड ट्रस्ट बेंगलुरु की निदेशक स्वागता राहा ने भी संबोधित किया। अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन आयुक्त एवं संयुक्त सचिव बाल अधिकार आयोग अनुप्रेरणा सिंह कुंतल ने किया।

इस अवसर पर राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से प्रकाशित ब्रोशर का विमोचन भी किया गया। सेमिनार में 4 तकनीकी सत्र रखे गए। विभिन्न सत्रों में पोक्सो एक्ट के तहत पीड़ितों के बचाव, सभी हित धारकों में क्षमता संवर्धन, प्रशिक्षण, जांच, पीड़ित प्रतिकार योजना बच्चों के अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया, पुलिस की भूमिका, पोक्सो एक्ट को प्रभावी बनाने व प्रभावी क्रियान्वयन पर विचार विमर्श किया गया।

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