सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान की जासूसी करने वाले भारतीय को 10 लाख रुपए मुआवजा देने का दिया आदेश, जानिए पूरा मामला...

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के जासूसी मिशन और पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी करने के तथ्यों पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनी।

 
सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान की जासूसी करने वाले भारतीय को 10 लाख रुपए मुआवजा देने का दिया आदेश, जानिए पूरा मामला...

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को पाकिस्तान की जासूसी करने वाले भारतीय को 10 लाख रुपए एक्स ग्रेशिया (मुआवजा) देने का आदेश दिया। महमूद अंसारी नाम के इस शख्स का दावा था कि उसे सीक्रेट मिशन पर पाकिस्तान भेजा गया था। लेकिन वहां पकड़े जाने के बाद उसे 14 साल तक जेल में रखा गया। मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रवींद्र भट ने की। कोर्ट ने फैसला दिया कि अनुग्रह राशि के तौर पर 10 लाख रुपए, 3 हफ्ते के भीतर याचिकाकर्ता को दिए जाएं। हालांकि इससे ये न समझा जाए कि ये पैसा उनके दायित्व या अधिकार से जुड़ा है। तो वही सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) विक्रमजीत बनर्जी ने कहा था कि राज्य का याचिकाकर्ता से कोई लेना-देना नहीं है। अंसारी को आखिरी बार 19 नवंबर 1976 को पेमेंट की गई थी। 1977 के बाद से उन्होंने अपनी सैलरी नहीं ली है।

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कोर्ट ने याचिकाकर्ता के जासूसी मिशन और पोस्टल डिपार्टमेंट में नौकरी करने के तथ्यों पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनी। इसके बाद सीजेआई यूयू ललित ने पीड़ित के पक्ष में फैसला सुनाया। पारिवारिक हालातों को ध्यान में रखते हुए मुआवजे के तौर पर गुजारा भत्ता दिए जाने का सरकार को निर्देश दिया। पहले यह 5 लाख रुपए तय हुआ था लेकिन 75 साल उम्र और बेटी पर निर्भरता को देखते हुए इसे 10 लाख कर दिया गया। जस्टिस भट ने याचिकाकर्ता अंसारी से कहा, "आप पाकिस्तानी रेंजरों का हिस्सा थे। यदि आप वाकई एक विध्वंसक भूमिका में गए थे, तो आपको बताना चाहिए था।"

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि उसका पाकिस्तानी सेना से कोई लेना-देना नहीं है। उन्हें 1987 में रिहा कर दिया गया और दो साल तक पाकिस्तान के भारतीय दूतावास में रखा गया। 1989 में वे भारत वापस आ गए। साथ ही कोर्ट ने पाकिस्तान की अदालत के फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया गया था। साथ ही यह भी कहा कि सजा का आधार एक भारतीय का पाकिस्तान में जासूसी करते पाया जाना और सजा मिलना नही हैं। सजा का आधार है कि वे रेजिमेंट का हिस्सा थे। एक वर्दीधारी सैनिक के रूप में उन्होंने कुछ काम किए। इसलिए कोर्ट मार्शल किया गया और दंडित किया गया।

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दरअसल, राजस्‍थान के रहने वाले महमूद अंसारी 1966 में डाक विभाग में काम करते थे। भारत सरकार के स्पेशल ब्यूरो ऑफ इंटेलिजेंस ने उन्हें 1972 में देश के लिए सेवाएं देने कहा। और उन्हें सीक्रेट ऑपरेशन के लिए पाकिस्तान में भेजा गया। अंसारी भाग्यशाली रहे और सौंपे गए काम को दो बार पूरा कर लिया। लेकिन तीसरी बार पाकिस्तानी रेंजरों ने उन्हें पकड़ लिया। अंसारी को 23 दिसंबर 1976 को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार हो गए। अंसारी का कोर्ट मार्शल किया गया। उन पर ऑफिसिय‌ल सीक्रेट एक्ट,1923 (पाकिस्तान का कानून) की धारा 3 के तहत मुकदमा चला। और 14 साल की जेल हुई। 1989 में जब अंसारी रिहा होकर लौटे तो उन्होंने नौकरी के लिए अधिकारियों से संपर्क किया। 

उन्हें बताया गया कि उनकी सेवाएं 31 जुलाई 1980 को ही समाप्त कर दी गईं। प्रशासनिक न्यायाधिकरण ने भी 2000 में बहाली और बैकवेज की उनकी याचिका खारिज कर दी। 2017 में राजस्थान हाईकोर्ट ने भी देरी और अधिकार क्षेत्र का हवाला देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद अंसारी ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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