Supreme Court: आरक्षण लाभ मुद्दे पर केंद्र को रुख स्पष्ट करने के लिए मिला 3 सप्ताह का समय, अगली सुनवाई 11 अक्तूबर को

 
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शीर्ष अदालत में दायर एक जनहित याचिका (पीआईएल) में धर्मांतरित दलितों के लिए उसी स्तर पर आरक्षण की मांग की गई है, जो हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के बाद अनुसूचित जातियों के लिए है। 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र को उन याचिकाओं पर अपना रुख स्पष्ट करने के लिए तीन महीने का समय दिया, जिनमें ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण का मुद्दा भी शामिल है। 

शीर्ष अदालत में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में धर्मांतरित दलितों के लिए उसी स्तर पर आरक्षण की मांग की गई है, जो हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म के बाद अनुसूचित जातियों के लिए है। 

एक अन्य याचिका में सरकार को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि अनुसूचित जाति मूल के ईसाइयों को वही आरक्षण लाभ दिया जाए जो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। 

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यमूर्ति एसके कौल की अध्यक्षता वाली पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को बताया कि इस मुद्दे के निहितार्थ हैं और वह सरकार के मौजूदा रुख को रिकॉर्ड में रखेंगे। 

न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ ने कहा,  सॉलिसिटर जनरल ने प्रस्तुत किया कि वह इस मुद्दे की वर्तमान स्थिति को रिकॉर्ड पर रखना चाहेंगे, जो दलित समुदाय से लेकर निर्दिष्ट समुदाय के अलावा अन्य तक के लिए आरक्षण के दावे के विस्तार के लिए प्रार्थना से संबंधित है, उनके अनुरोध पर तीन सप्ताह का समय दिया जाता है। पीठ ने कहा कि इसमें शामिल कानूनी मुद्दे को सुलझाना होगा। 

पीठ ने मौखिक रूप से कहा, "ये सभी मामले जो सामाजिक प्रभाव के कारण लंबित हैं ..और जब दिन आता है तो हमें फैसला करना होता है।"

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एक याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि सरकार ने पहले न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग नियुक्त किया था जिसने इस मुद्दे पर विस्तृत रिपोर्ट दी थी। 

इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा, वह यह कहने के लिए सही है कि एक न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग नियुक्त किया गया था। लेकिन संभवत: वह इस बात से चूक गए कि तत्कालीन सरकार ने आयोग की सिफारिशों को इस आधार पर स्वीकार नहीं किया था कि उन्होंने उन्होंने (न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्रा आयोग) कई तथ्यों पर विचार नहीं किया। 

पीठ ने पक्षों से अपना संक्षिप्त सारांश दाखिल करने के लिए कहा। अदालत ने मामले पर अगली सुनवाई की तारीख 11 अक्टूबर तय की है। 

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित याचिकाओं में से एक में कहा गया है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से अलग धर्म को मानने वाले अनुसूचित जाति के व्यक्ति को संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुच्छेद 3 के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता है। 

याचिका में कहा गया है कि धर्म में परिवर्तन से सामाजिक अपवाद नहीं बदलता है और जाति अनुक्रम (Caste Hierarchy) ईसाई धर्म के भीतर भी कायम है, भले ही वह धर्म इसे मानने से इनकार करता है। इसमें कहा गया है कि यह प्रतिबंध समानता, धार्मिक स्वतंत्रता और गैर-भेदभाव के मौलिक अधिकार के खिलाफ है।
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