पद्मश्री नृत्यांगना गुलाबो ने कालबेलिया नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई

 
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पन्नालाल मेघवाल लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार

राजस्थान का कालबेलिया लोकनृत्य देश ही नहीं विदेशों में भी प्रसिद्ध है। कालबेलिया नृत्यांगना गुलाबो ने देश-विदेश  में महिलाओं को प्रशिक्षित किया। उन्होंने देश-विदेश में अनेक कार्यक्रम आयोजित कर कालबेलिया लोकनृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है। यूनेस्को ने सन् 2010 में कालबेलिया लोकनृत्य को अमूर्त विरासत सूची में शामिल किया है। भारत सरकार ने उन्हें सन् 2016 में पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया है। देश- विदेश में कालबेलिया लोकनृत्य का परचम फहराने में नृत्यांगना गुलाबो का अद्वितीय योगदान है।

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कालबेलिया लोकनृत्य राजस्थान की घुमन्तु कालबेलिया जनजाति द्वारा होली एवं तीज त्यौहारों पर किया जाने वाला पारंपरिक नृत्य है। कालबेलिया महिलाएँ तीज त्यौहारों पर मदमस्त होेकर नृत्य करती हैं। बीन के स्वर और डफ की लय पर ये महिलाएँ गीत गाती हुई नृत्य करती हैं। ये नृत्यांगनाए पैरों का संचालन हाथों की मुद्राएँ एवं कटि को बखूबी मटकाती है। इन कालबेलिया नृत्यांगनाओं का गीत एवं डफ की लय पर अपने शरीर की लोच का प्रदर्शन देखते ही बनता है। बीन की धुन के साथ इनका नृत्य ऐसे लगता है मानो नागिन अलमस्त होकर झूम रही है। नृत्य के दौरान ये नृत्यांगनाएं आँखों की पुतलियों से अगूठियां एवं मुँह से नोट उठाने के हैरत अंगेज करबत दिखाकर दर्शकोें को अचम्भित कर देती हैं।

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नृत्य के दौरान पुरूष बीन, डफ एवं मंजीरा वादन करते हुए गायकी में साथ देते है। अररर काल्यो कूद पड्यो मेला में, चिरमी, दीवाना, चूडी चमके रे, होलिया में उडे रे गुलाल, केसरिया हजारी गुल रा फूल, पणिहारी, ईडाणी, बीछूड्या, बायरियो, हिचकी एवं नींबोली आदि मोहक गीतों पर कालबेलिया नृत्यांगनाएं मदमस्त होकर तीव्र गति से आकर्षक नृत्य करती है। कंठ का सुरीलापन वाद्यों की मधुरता व नृत्य की गति से इनके नृत्य अत्यन्त मनभावन होते है, जिसे दर्शक घण्टों निहारते रहते है।

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राजस्थान की घुमक्कड जाति के कालबेलिया स्वंय को जोगी कहते है। यह जाति राजस्थान के जोधपुर, पाली, सिरोही, भरतपुर, अजमेर, कोटा, भीलवाड़ा, चित्तौडगढ, उदयपुर एवं बांसवाड़ा जिलों में रहती है। ये हिन्दू धर्म को मानते है। कुछ कालबेलिये सांप पकडने और विष के व्यापार के अलावा खेती-बाडी एवं मजदूरी भी करते है। कालबेलिया जाति के जीवन में संगीत एवं नृत्य का विशिष्ट स्थान है। होली, दीपावली एवं तीज त्यौहारों पर इस जाति के लोग बडी मस्ती से लोक गीत के साथ नृत्य करते हैं।

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कालबेलिया अपने आपको कन्नीपाव के वंशज मानते है। गुरू जलन्धरनाथ के दो शिष्य हुए- गोरखनाथ एवं कन्नीपाव। गोरखनाथ एवं कन्नीपाव के आचार-विचार में काफी अन्तर था। गोरखनाथ सीधे-सादे एवं सद् विचार के व्यक्ति थे, जबकि कन्नीपाव चंचल एवं शैतान प्रवृति के थे। दोनों शिष्यों को अपनी कला विद्या पर बडा गुमान था। उनकी कला परीक्षा लेने के लिए गुरू जलन्धरनाथ ने दोनों शिष्यों को व्यक्तिगत कौशल से प्याला बनाने का आदेश दिया।

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पन्नालाल मेघवाल
वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार।    

कालबेलिया जाति का मानना है कि सद् विचार के गोरखनाथ ने अपनी कला से अमृत का प्याला प्रस्तुत किया लेकिन शैतान प्रवृति के कन्नीपाव ने सांपों व बिच्छुओं को पकडकर उनका जहर निकाला और विश का प्याला पेश किया। दोनों के प्यालों में से जहर के प्याले को कौन अंगीकार करे, यह समस्या उठ खडी हुई। इस कुकृत्य पर गुरू जलन्धरनाथ, शिष्य कन्नीपाव पर अत्यधिक नाराज हुए और श्राप दिया कि- हे दुष्ट कन्नीपाव ! यह जहर का  प्याला तुम स्वंय ही बरताओ। इस घृणित पाप के कारण तुम आज से गाँव की सीमा के बाहर रहो और तभी से उस ‘काल’ (जहर) के प्याले को बरताने के कारण ‘ कालबेलिया’ कहलाऐ। यह कालबेलिया जाति स्वंय को कन्नीपाव का वंशज मानती है।

कन्नीपाव के वंशज कालबेलिये तभी से गाँव की सीमा से बाहर रहने लगे तथा साँप बिच्छु एवं अन्य जहरीले जानवर पकडकर उनका विष निकालकर व्यापार करने लगे। ये लोग साँप के काटने पर जहर उतारने तथा लोगों को साँप के दर्शन कराकर अपनी उदर-पूर्ति करने लगे। ऐसा माना जाता है कि काला नाग किसी को डस जाय तो वह सीधा काल के मुँह में जाता है, ऐसे काल को बेलने या वश में करने की कला से ही इस जाति का नाम कालबेलिया पडा। काल यानि नाग, बेलि यानि संरक्षण अतः नाग (साँप) को संरक्षण देने वाले होने के कारण ये कालबेलिये कहलाते हैं।

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पद्मश्री से सम्मानित प्रसिद्ध नृत्यांगना गुलाबो ने कन्नीपाव वंश के कालबेलिया  परिवार में जन्म लिया है। उन्होंने देश-विदेश में धूम मचाकर कालबेलिया नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है।

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