Hijab Ban Supreme Court: तिलक, ईरान, आम्बेडकर... हिजाब मामले पर सुप्रीम सुनवाई में दी गईं दलीलें

 
Hijab Ban Supreme Court

Supreme Court Hearing On Hijab Ban: सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कई इस्लामिक देशों में महिलाएं हिजाब के खिलाफ लड़ रही हैं। जस्टिस सुधांशु धूलिया ने पूछा कि कौन से देश में? तो मेहता ने जवाब दिया, 'ईरान।'

नई दिल्ली। Supreme Court Hearing On Hijab Ban: हिजाब मामले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान मंगलवार को ईरान का जिक्र हुआ। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील रखी कि इस्लाम की शुरुआत से हिजाब नहीं था। जब जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कहा कि कुछ विद्वानों ने कहा कि मूल शब्द 'खिमर' था और पर्शियन टेक्स्ट में यह हिजाब हो गया। इसपर एसजी ने कहा कि मैंने कुरान नहीं पढ़ी है मगर केवल कुरान में जिक्र होने भर से हिजाब इस्लाम की जरूरी परंपरा नहीं बन जाएगा। मेहता ने कुछ देर बाद कहा कि कई 'संवैधानिक इस्लामिक देशों में महिलाएं हिजाब के खिलाफ लड़ रही हैं। इसपर जस्टिस धूलिया ने पूछा कि कौन से देशों में? एसजी ने जवाब दिया, '

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ईरान। तो यह एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। कुरान में जिक्र से ही यह जरूरी नहीं हो जाता, इसकी इजाजत हो सकती है या यह आदर्श परंपरा हो सकती है।' इसके बाद एसजी ने जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच के सामने अमेरिकी अदालतों के कुछ फैसलों का जिक्र किया।

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सरकार की ओर से पेश हुए मेहता ने कहा कि दो तथ्य ध्यान में रखने चाहिए। पहला- 2021 तक कोई भी छात्रा हिजाब नहीं पहन रही थी। न ही कभी यह सवाल उठा। दूसरा- यह कहना बेहद गलत होगा कि नोटिफिकेशन में केवल हिजाब पर प्रतिबंध लगाया गया है। दूसरे समुदाय ने भगवा शॉल में आना शुरू कर दिया। भगवा शॉल पर भी प्रतिबंध है। एक और पहलू है। मैं बढ़ा-चढ़ाकर नहीं कह रहा लेकिन अगर सरकार ऐसा कदम नहीं उठाती तो अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा न करने की दोषी होती।

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"मान लीजिए कल को बार काउंसिल ऑफ इंडिया 'तिलक' पर प्रतिबंध लगा दे तो हम तब तक इसे नहीं लगा सकेंगे जब तक हम यह साबित न कर लें कि यह अनिवार्य धार्मिक परंपरा है, जो कि यह नहीं है।"
तुषार मेहता, सॉलिसिटर जनरल

एसजी ने डॉक्टर भीमराव आम्बेडकर का भी जिक्र किया। उन्होंने कहता कि आम्बेडकर कहते हैं कि संरक्षण उन अधिकारों के लिए जो हैं धार्मिक रूप से अनिवार्य हैं। मेहता ने कहा, 'मान लीजिए किसी ने मेरे भाई को मार दिया और मैं मानता हूं कि उसे तब तक शांति नहीं मिलेगी जब तक मैं बदला नहीं ले लेता, हत्या धार्मिक रूप से अनिवार्य परंपरा नहीं हो सकती।'

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'PFI ने शुरू किया हिजाब मूवमेंट'
एसजी ने कहा कि 29 मार्च को उडुपी पीयूसी ने लड़कियों ने यूनिफॉर्म का प्रस्ताव पारित किया। छात्राएं तब तक यूनिफॉर्म पहन रही थीं जिसमें हिजाब नहीं था। एडमिशन के वक्त, याचिकाकर्ताओं ने PUC के सभी नियमों का पालन करने पर हामी भरी थी। मेहता ने आगे कहा, 'अबतक यूनिफॉर्म फॉलो हो रही थी। कोई भी हिजाब या भगवा शॉल पहनने पर जोर नहीं दे रहा था। 2022 में सोशल मीडिया पर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने एक मूवमेंट शुरू किया। लगातार मेसेज दिए गए कि हिजाब पहनना शुरू करो। यह कुछ बच्चों की तरफ से अचानक किया गया काम नहीं था। वह एक बड़ी साजिश का हिस्सा थे और बच्चे वही कर रहे थे जो उन्हें कहा जा रहा था।' एसजी ने कहा कि यह सब बातें (कर्नाटक) हाई कोर्ट के सामने भी रखी गई थीं।

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मुस्लिम पक्ष ने आज क्या दलीलें दीं?
मुस्लिम याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ एडवोकेट दुष्यंत दवे पेश हुए। दवे ने कहा कि हर कोई भगवान को अलग-अलग नजर से देखता है। केरल में भगवान अयप्पा के अनुयायी काले कपड़ों में जाते हैं... हमारे कांवडियों को देखिए, आज वो भगवान शिव के भजन बजातीं म्यूजिक वैन्स के साथ चलते हैं... सबको अपनी धार्मिक स्वंतत्रता का आनंद लेने का अधिकार है। दवे ने कहा कि 'यूनिफॉर्म समाज के बहुसंख्यक हिस्से पर एक अनावश्यक बोझ है। कई लोगों के पास यूनिफॉर्म खरीदने के पैसे नहीं होते।' इसपर जस्टिस गुप्ता ने कहा कि 'यूनिफॉर्म लेवलर है, ताकि विसंगता न पैदा हो। आपकी अमीरी या गरीबी यूनिफॉर्म से नहीं आंकी जा सकती।'

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कर्नाटक हाई कोर्ट ने शिक्षण संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को सही ठहराया था। उसी फैसले को चुनौती देती याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। बुधवार को भी मामले में सुनवाई जारी रहेगी।

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