Cyber Bullying: दोस्तों ने किया ऑनलाइन टॉर्चर तो दी जान: आप अपने बच्चो को बचाए साइबर बुलीइंग के खतरनाक खतरे से, ये अपनाएं फाॅर्मूला

 
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नई दिल्ली। आज गैजैट्स इस्तेमाल करने में बच्चे बड़ों से भी आगे निकल गए हैं। 3 से 4 साल की उम्र में ही टेक सेवी हो चुके ये बच्चे मोबाइल, आईपैड और लैपटॉप भी चलाने में माहिर हैं। उम्र थोड़़ी बढ़ी तो ऑनलाइन गेम्स के उस्ताद बन जाते हैं।

टीनएज में पहुंचने तक उन्हें पोर्नोग्राफी वीडियो को कंज्यूम करने का चस्का भी लग जाता है। इंटरनेट सिक्योरिटी पर काम कर रही संस्था ‘साइबर सेफ्टी किड्स’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 8 से 12 वर्ष की उम्र के 95 प्रतिशत बच्चे स्मार्टफोन से लैस हैं। कुछ को छोड़ दें तो सोशल मीडिया पर सभी के अकाउंट हैं और वे इस पर तेजी से एक्टिव हैं। पोस्ट करना, फोटो अपलोड करना, मैसेज भेजना, स्टेट्स अपडेट करना जैसे सारे फीचर्स का इस्तेमाल करना जानते हैं और कर रहे हैं।

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ये हाईटेक बच्चे ज्यादातर समय इंटरनेट पर एक्टिव रहते हैं और उस दुनिया से अनफिल्टर्ड चीजें ले रहे हैं। इस वजह से इन बच्चों के साइबर बुलीइंग करने के खतरे भी बढ़ गए हैं।

क्या बच्चे ऑनलाइन बुलीइंग में महारत हासिल कर रहे हैं? आपका ये सवाल जायज है…
अमेरिकी कंप्यूटर सिक्योरिटी सॉफ्टवेयर कंपनी McAfee के सर्वे के अनुसार, दुनिया में किसी भी देश के मुकाबले भारत में बच्चे साइबर बुलीइंग ज्यादा कर रहे हैं। इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले भारत के 45 प्रतिशत बच्चों ने माना कि उन्होंने कभी न कभी साइबर बुलीइंग की है। और उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि जिन बच्चों को उन्होंने अपना टारगेट बनाया वे उन्हें जानते तक नहीं थे। वहीं, 48 प्रतिशत भारतीय बच्चों ने माना कि उन्होंने उन बच्चों के साथ साइबर बुलीइंग की है, जिन्हें वे पहले से अच्छी तरह जानते थे।

भारत में साइबर बुलीइंग ज्यादा क्यों होने लगी है?

घर में गैजेट्स की भरमार और ऑनलाइन एजुकेशन के बढ़ते ट्रेंड ने जिंदगी और पढ़ाई-लिखाई भले ही आसान की हो, मगर इसके साइड इफेक्ट्स भी कम नहीं हैं। McAfee के एग्जीक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट गगन सिंह भी मानते हैं कि कोविड के कारण बच्चे लंबे समय तक घर पर रहे। ऑनलाइन पढ़ाई की वजह से बच्चों को मोबाइल और कंप्यूटर पर छूट मिली जो अब धीरे-धीरे लत में बदल गई है।

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नतीजा, बच्चे इसे टूल के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं। बच्चों को यह लगता है कि वर्चुअल दुनिया में वो कुछ भी करेंगे तो कोई उन्हें रोकने-टोकने वाला नहीं है। आपत्तिजनक कमेंट या फोटो पोस्ट करने के बाद भी वो बचकर निकल सकते हैं। जबकि वे यह नहीं जानते कि इस तरह की हरकतें साइबर बुलीइंग है और यह एक बहुत बड़ा क्राइम है।

अब आगे बढ़ने से पहले साइबर बुलीइंग की एक कहानी जान लेते हैं, कैसे हाईटेक बच्चे इस दलदल में फंस रहे हैं।

‘किसी ने मेरी भतीजी की तस्वीर से छेड़छाड़ कर उसे फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। पोस्ट करने वाले ने मेरी भतीजी का फेक अकाउंट बनाकर उसी की फोटो अपलोड कर दी। एक अनजान शख्स ने भतीजी को मैसेज किया और कहा कि वह उससे बात करना चाहता है। धमकी दी कि अगर उसने बात नहीं मानी तो उसकी और परिवार के दूसरे लोगों की ऐसी ही तस्वीरों को पोस्ट कर देगा। मैंने इसके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई। जांच होने पर पता चला कि यह हरकत एक नाबालिग लड़के की थी। उसके पेरेंट्स ने ऑनलाइन पढ़ाई के लिए उसे मोबाइल दिया था, लेकिन उसने इसका गलत इस्तेमाल किया।’

यह मामला 2016 का है जिसकी शिकायत मुंबई साइबर क्राइम सेल में की गई थी। सुरक्षा की वजह से घटना से जुड़े किसी भी व्यक्ति का नाम हम उजागर नहीं कर रहे हैं।

साइबर बुलीइंग बच्चे क्यों कर रहे? इससे पहले इसे समझते हैं कि साइबर बुलीइंग क्या है।
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इंटरनेट तक आसान पहुंच ने बच्चों को एडिक्ट बनाया

नेशनल इंस्टीड्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस (NIMHANS) बेंगलुरु के प्रोफेसर डॉ. वी सेंथिल रेड्डी बताते हैं कि जब बच्चे ऑनलाइन नहीं थे तब भी बुलीइंग होती थी। क्लास में एक-दूसरे को चिढ़ाना, कमेंट करना, मारपीट की घटनाओं से हम सब वाकिफ रहे हैं। लेकिन अब साइबर बुलीइंग का रेशियो बढ़ गया है। आज अधिकतर बच्चे मोबाइल-कंप्यूटर इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में वो पीड़ित भी हो रहे और बुलीइंग भी कर रहे हैं।

क्यों साइबर बुलीइंग कर रहे हैं बच्चे, ऐसे समझिए

बच्चे साइबर बुलीइंग क्यों कर रहे हैं? इस पर डॉ. रेड्डी बताते हैं कि इसके पीछे कई फैक्टर हैं। जैसे स्कूलों में गॉसिप करने वाली लड़कियां भी होती हैं। दो लड़कियों के बीच दोस्ती है तो उनके बीच कैसे दूरी पैदा करें, उनके कान भरें, उनमें झगड़ा हो। तब ऐसी लड़कियां साइबर बुलीइंग करती हैं। इन्हें साइबर की दुनिया में मीन गर्ल कहा जाता है।

लंबे समय तक बच्चों के ऑनलाइन रहने के क्या खतरे हैं?

इंस्टाग्राम या फेसबुक पर उनके नाम से ऐसे पोस्ट करना या फोटो डालना जिससे दोनों में बातचीत बंद हो जाए। किसी लड़की के अच्छे मार्क्स आने या किसी के बॉयफ्रेंड को लेकर जलन करना भी साइबर बुलीइंग की वजह बन सकती है।

कई बार जब बच्चे साइबर बुलीइंग के शिकार होते हैं तो वो भी बदला लेने के लिए ऐसा करते हैं। कई बार बच्चे मस्ती के लिए बुलीइंग करते हैं। उनके टारगेट पर कोई भी हो सकता है चाहे वो उनके क्लासमेट्स हों या टीचर या फिर कोई अजनबी। ऐसे बच्चे अपने दोस्तों को बताते हैं कि देखो वो क्या करने जा रहे हैं। इसमें बहुत मजा आएगा।

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डॉ. रेड्डी बताते हैं कि जो बच्चे ऐसा करते हैं उनका पढ़ाई के प्रति कोई अटेंशन नहीं रहता। पेरेंट्स भी उन पर ध्यान नहीं देते। कुछ बच्चे तो केवल इसलिए साइबर बुलीइंग करते हैं कि वो क्लास के खास ग्रुप का ध्यान अपनी ओर खींच सकें। वो उनके ग्रुप में शामिल हो सकें।

इसे कुछ और उदाहरणों से समझ सकते हैं। जैसे कुछ बच्चे खुद को स्मार्ट समझते हैं। पढ़ने-लिखने में आगे, टीचर के भी फेवरेट…वो ऐसे बच्चों को टारगेट​​​​ करते हैं, जो चुपचाप रहते हैं। उनके बारे में अफवाहें फैलाते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि साइबर बुलीइंग करने वाले बच्चों को लगता है कि वो कुछ गलत नहीं कर रहे हैं और वो उसमें अपनी शान समझते हैं। ऐसा इसलिए कि उन्हें इस बात का अंदाजा ही नहीं होता कि वे पीड़ित बच्चे को कितनी तकलीफ पहुंचा रहे हैं। दूसरी बात, ऐसे बच्चों को हमेशा लगता है कि वह साइबर बुलीइंग करने पर कभी पकड़े नहीं जाएंगे। क्योंकि ये बच्चे जरूरत से ज्यादा ओवर कॉन्फिडेंट होते हैं। टेक्नोलॉजी उन्हें पावरफुल बनाती है और ऐसे बच्चे बन जाते हैं ‘पावर हंग्री’।

भारत में 2021 में साइबर बुलीइंग के 1176 मामले सामने आए। इसमें 870 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आइए जानते हैं कि देश में साइबर बुलीइंग रोकने के लिए क्या कानून है।

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ये बुलीइंग किसी की जान ले सकती है, सुसाइड के लिए मजबूर भी कर सकती है

घटना पिछले साल 2021 मुंबई की है। 11वीं में पढ़ने वाले 16 साल के लड़के ने बुलीइंग से परेशान होकर सुसाइड कर लिया। बुलीइंग करनेवाले दो लड़के उसके ही क्लासमेट्स थे। जब वह 10वीं में था तबसे बुलीइंग का शिकार था।

बेंगलुरु की एडोलसेंट हेल्थ स्पेशियलिस्ट डॉ. उमा राव कहती हैं, ’बच्चों के लिए फिजिकल स्पेस कम हो गया है। बच्चे अपने घरों में सिमट गए हैं। वो स्कूल-कॉलेज या प्लेग्राउंड में खेलने नहीं जाते। उन्हें वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम या फेसबुक पर रहना अच्छा लगता है। उन्हें पता होता है कि ट्रेंड में क्या है, कौन सा मोबाइल फोन या टैबलेट के क्या फीचर्स हैं। इन जानकारियों के साथ ही बच्चे वो चीजें भी सीख लेते हैं जिसके जरिए किसी को चोट पहुंचाई जा सके।’

बच्चों में साइबर बुलीइंग का ट्रेंड बढ़ रहा है महाराष्ट्र में इसके मामले सबसे ज्यादा सामने आए हैं।

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‘द जर्नल ऑफ साइकोलॉजिकल रिसर्च ऑन साइबर बुलीइंग’ की रिपोर्ट कहती है कि अगर 10 बच्चे सुसाइड करते हैं तो इनमें से 5 बच्चे किसी न किसी रूप में साइबर बुलीइंग के शिकार थे। ऐसे बच्चों में अकेलापन, आत्मविश्वास में कमी, लोगों से मिलने-जुलने में घबराना जैसी बातें देखने को मिलती हैं।

जो बच्चे पीड़ित होते हैं उन्हें लगता है कि वो स्थिति को संभाल लेंगे, लेकिन ऐसा कर नहीं पाते। ऐसे बच्चों के सुसाइड की भी घटनाएं सामने आईं हैं।

सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री, रांची की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गोडी संघमित्रा बताती हैं कि ट्रिपल M के जरिए साइबर बुलीइंग की घटनाओं से बचा सकता है। मॉडलिंग, मॉनिटरिंग और मेंटरिंग यानी ट्रिपल M से पेरेंट्स अपने बच्चे के प्रति अलर्ट रह सकते हैं।

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सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकेट्री, रांची की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गोडी संघमित्रा का कहना है कि हम जो करते हैं बच्चे भी वही करते हैं। जब बच्चे बड़ों के नॉर्मल बिहेवियर की नकल करते हैं तो पेरेंट्स को गैजेट्स चलाता देख उनको क्यों नहीं कॉपी करेंगे। बच्चे अगर साइबर बुलीइंग कर रहे हैं या फिर इसके विक्टिम हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं पेरेंट्स भी जिम्मेदार हैं। जब बच्चा टेक सेवी होने लगता है तो पेरेंट्स खुशी और गर्व महसूस करते हैं, लेकिन इसी समय उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है कि क्या बच्चा टेक सेवी होने के साथ-साथ टेक्नोलॉजी का गलत इस्तेमाल तो नहीं कर रहा।

बच्चा साइबर बुलीइंग तो नहीं कर रहा, ऐसे करें पहचान

  • घंटों मोबाइल पर लगा है
  • वॉट्सऐप चैट डिलीट किया है
  • सोशल मीडिया पर कई अकाउंट हैं
  • डायरी में कई पासवर्ड लिखे हैं
  • ऐप को लॉक कर रखा है
  • दूसरों के मोबाइल पर एनीडेस्क ऐप इंस्टॉल करे

आपका बच्चा बुलीइंग का शिकार है तो ऐसे पहचानें

  • अचानक सोशल मीडिया छोड़ दे
  • ऑनलाइन रहने में इंट्रेस्ट न दिखाना
  • इंटरनेट के बारे में कोई बात नहीं करना
  • कोई मैसेज मिलने पर असहज महसूस करना
  • बिना पढ़े ही कोई मैसेज डिलीट कर देना
  • ऑनलाइन गेम खेलने से मना कर देना

साइबर बुलीइंग से बच्चा दूर रहे, इसके लिए ये स्ट्रेटेजी अपनाएं

  • पोस्ट पर कोई आपत्तिजनक कमेंट करे तो उस पर रिएक्शन से बचें।
  • बुली करने वाला साजिश के तहत उकसा सकता है, इसलिए रिएक्ट न करें।
  • आपके साथ बुलीइंग हुई है तो उसके स्क्रीनशॉट को अपने पास जरूर रखें।
  • जो भी व्यक्ति परेशान कर रहा है उसे सोशल मीडिया पर तुरंत ब्लॉक करें।
  • यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम के सेफ्टी सेंटर पर भी शिकायत करें।
  • सोशल मीडिया सेटिंग्स चेक करें, कोई लूपहोल्स है तो उसे दूर करें।
  • बुलीइंग बढ़ने पर अपने पेरेंट्स, टीचर्स या दोस्तों से जरूर बात करें।

दूसरी भाषा के आपत्तिजनक शब्दों को रोमन में लिखकर परेशान करना

गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी अमृतसर के डिपार्टमेंट ऑफ कंप्यूटर इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में असिस्टेंट प्रोफेसर मुनीष सैनी बताते हैं कि बुलीइंग करने वाले तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हैं। जैसे किसी पोस्ट में आपत्तिजनक हिंदी और पंजाबी के शब्दों को रोमन में लिख देना। ऐसे में बुलीइंग करने वाले पकड़ में नहीं आते। हालांकि इनको रोकने के लिए नई टेक्नोलॉजी पर काम हो रहा है।

16 वर्ष की गीतांजलि राव ने बनाया है एल्गोरिदम

साइबर बुलीइंग को कम करने के लिए एक ओपन सोर्स API (एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) बनाया गया है। इसे भारतीय मूल की अमेरिकी नागरिक 16 वर्ष की गीतांजलि राव ने तैयार किया है।

गीतांजलि ने ऐसे एल्गोरिदम तैयार किए हैं जो किसी मैसेज, ई-मेल या सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से पहले ही आपत्तिजनक भाषा को पढ़कर पोस्ट होने से रोक सके। इस एंटी बुलीइंग एप को ‘KINDLY’ नाम दिया गया है। इस काम में माइक्रोसॉफ्ट CEO सत्या नडेला ने उनकी मदद की और ये ऐप UNICEF भी इस्तेमाल करेगा। गीतांजलि को टाइम मैगजीन ने ‘किड ऑफ द ईयर’ भी बताया था।

साइबर बुलीइंग को रोकने के लिए गीतांजलि की ‘KINDLY’ जैसी तकनीक से मदद मिलेगी। साथ ही पेरेंट्स, टीचर की जिम्मेदारी बनती है कि साइबर बुलीइंग के प्रति जागरूक किया जा सके।

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