जयपुर। दीपों का महापर्व दीपावली इस वर्ष विशेष ज्योतिषीय संयोग और तिथियों के बदलाव के चलते छह दिनों तक मनाया जाएगा। आमतौर पर पांच दिनों तक चलने वाला दीपोत्सव इस बार छह दिवसीय होगा। इसकी शुरुआत 6 नवंबर को धनतेरस के साथ होगी और समापन 11 नवंबर को भाईदूज के पर्व के साथ होगा। इस दौरान 7 नवंबर को नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और उत्तर भारत की परंपरा के अनुसार हनुमान जयंती मनाई जाएगी। वहीं, 8 नवंबर को दीपावली के अवसर पर माता लक्ष्मी और भगवान गणेश का विशेष पूजन होगा। इसके बाद 9 नवंबर को रामा-श्यामा, 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव तथा 11 नवंबर को भाईदूज का पर्व मनाया जाएगा।
इस वर्ष दीपावली का मुख्य पर्व 8 नवंबर को मनाया जाएगा। कार्तिक मास की अमावस्या तिथि और प्रदोष काल के विशेष संयोग में मां लक्ष्मी तथा भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली पर स्थिर लग्न में माता लक्ष्मी का पूजन करना विशेष फलदायी माना जाता है। वहीं, प्रतिपदा की उदयातिथि के आधार पर इस बार गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को होगी। तिथियों के इस विशेष क्रम के कारण दीपोत्सव के अलग-अलग पर्वों की तारीखों में बदलाव देखने को मिलेगा।
छह दिवसीय दीपोत्सव 2026 का पूरा कार्यक्रम
इस वर्ष छह दिवसीय दीपोत्सव की शुरुआत 6 नवंबर को धनतेरस से होगी। इसके अगले दिन 7 नवंबर को नरक चतुर्दशी, छोटी दीपावली और रूप चौदस का पर्व मनाया जाएगा। उत्तर भारत की धार्मिक परंपरा के अनुसार इसी दिन हनुमान जयंती भी मनाई जाएगी। 8 नवंबर को दीपावली के अवसर पर घरों और मंदिरों में महालक्ष्मी पूजन होगा। इसके बाद 9 नवंबर को रामा-श्यामा के रूप में लोग एक-दूसरे से मिलकर दीपावली की शुभकामनाएं देंगे। 10 नवंबर को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव आयोजित होगा, जबकि 11 नवंबर को भाईदूज के साथ छह दिवसीय दीपोत्सव का समापन होगा।
6 नवंबर: धनतेरस के साथ दीपोत्सव का शुभारंभ
दीपावली उत्सव का पहला प्रमुख पर्व धनतेरस 6 नवंबर को मनाया जाएगा। इसे धन त्रयोदशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद, स्वास्थ्य और आरोग्य का देवता माना जाता है। इसी कारण धनतेरस के दिन उनकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। साथ ही धन और संपन्नता के प्रतीक भगवान कुबेर की आराधना करने की भी परंपरा है।
धनतेरस पर सोना, चांदी, वाहन, पीतल और अन्य धातुओं के बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन घर में नई वस्तुओं की खरीदारी करने से सुख-समृद्धि और धन-वैभव में वृद्धि होती है। बाजारों में भी इस अवसर पर रौनक देखने को मिलती है और लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार आभूषण, बर्तन तथा घरेलू उपयोग की वस्तुओं की खरीदारी करते हैं।
त्रयोदशी तिथि: 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे से शुरू होकर 7 नवंबर को सुबह 10:48 बजे तक रहेगी।
इस दिन हस्त नक्षत्र और शुक्र प्रदोष का संयोग भी बताया गया है, जिसे खरीदारी और धार्मिक कार्यों के लिए शुभ माना जा रहा है।
7 नवंबर: नरक चतुर्दशी, रूप चौदस और हनुमान जयंती
दीपावली से एक दिन पहले मनाया जाने वाला नरक चतुर्दशी का पर्व छोटी दीपावली और रूप चौदस के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस दिन घरों में दीप जलाने की विशेष परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शाम के समय यमराज के नाम से चार मुख वाला दीपक जलाया जाता है। इसे यम दीपदान कहा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय दूर होता है और परिवार के सदस्यों को सुख-समृद्धि तथा दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
उत्तर भारत की परंपरा में इस दिन हनुमान जयंती भी मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में भगवान हनुमान का प्राकट्य हुआ था। इस अवसर पर श्रद्धालु हनुमान मंदिरों में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और बजरंगबली से जीवन के संकटों को दूर करने तथा सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं।
चतुर्दशी तिथि: 7 नवंबर को सुबह 10:38 बजे से शुरू होकर 8 नवंबर को सुबह 11:29 बजे तक रहेगी।
इस दिन चित्रा नक्षत्र का संयोग भी बताया गया है।
8 नवंबर: दीपावली पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश का विशेष पूजन
इस वर्ष दीपावली का मुख्य पर्व 8 नवंबर को मनाया जाएगा। कार्तिक अमावस्या के दिन प्रदोष काल में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि दीपावली की रात विधि-विधान से लक्ष्मी-गणेश का पूजन करने से घर में सुख, शांति, समृद्धि और धन-वैभव का आगमन होता है।
दीपावली पर स्थिर लग्न में लक्ष्मी पूजन करना विशेष शुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वृषभ लग्न को गृहस्थों के लिए अनुकूल माना गया है। इस दौरान माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में स्थायी सुख-समृद्धि का वास होने की मान्यता है। दीपावली के अवसर पर लोग अपने घरों को दीपों, रंगोली और आकर्षक सजावट से सजाते हैं। शाम होते ही घरों और मंदिरों में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं तथा मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए विशेष तैयारियां की जाती हैं।
अमावस्या तिथि: 8 नवंबर को सुबह 11:29 बजे से शुरू होकर 9 नवंबर को दोपहर 12:31 बजे तक रहेगी।
महालक्ष्मी पूजन के प्रमुख शुभ मुहूर्त
प्रदोष काल में लक्ष्मी पूजन का सामान्य शुभ समय शाम 5:36 बजे से रात 8:02 बजे तक बताया गया है। गृहस्थों के लिए स्थिर वृषभ लग्न का समय शाम 6:04 बजे से रात 8:01 बजे तक रहेगा।
विशेष पूजा मुहूर्त की बात करें तो शाम 6:16 बजे से 6:28 बजे तक और शाम 6:52 बजे से 7:05 बजे तक का समय भी शुभ बताया गया है। वहीं, निशीथ काल में स्थिर सिंह लग्न का समय रात 12:34 बजे से अगले दिन रात 2:50 बजे तक रहेगा। यह समय विशेष धार्मिक और तांत्रिक साधनाओं के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
9 नवंबर: रामा-श्यामा पर रिश्तेदारों और परिचितों से होगा मेल-मिलाप
दीपावली के अगले दिन यानी 9 नवंबर को रामा-श्यामा का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन अमावस्या तिथि दोपहर 12:31 बजे तक रहेगी और इसके बाद प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हो जाएगी। तिथियों की विशेष स्थिति के चलते इस बार गोवर्धन पूजा के बजाय रामा-श्यामा की परंपरा निभाई जाएगी।
रामा-श्यामा का पर्व पारिवारिक मेल-मिलाप और आपसी प्रेम को बढ़ावा देने का अवसर माना जाता है। इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों के घर जाकर दीपावली की शुभकामनाएं देते हैं। बड़े-बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है और एक-दूसरे को गले लगाकर खुशियां साझा की जाती हैं। इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पुराने मतभेदों को भुलाकर रिश्तों में मिठास और अपनापन बढ़ाना भी है।
10 नवंबर: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव
इस वर्ष गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को मनाई जाएगी। सामान्य तौर पर यह पर्व दीपावली के अगले दिन मनाया जाता है, लेकिन इस बार प्रतिपदा तिथि की उदयातिथि के आधार पर इसकी तारीख निर्धारित की गई है।
गोवर्धन पूजा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण और ब्रजभूमि की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र की पूजा के स्थान पर प्रकृति और गोवर्धन पर्वत की आराधना करने का संदेश दिया था। इससे नाराज होकर इंद्रदेव ने ब्रज में मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी थी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी छोटी अंगुली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रजवासियों और उनके पशुधन को भारी वर्षा से सुरक्षित रखा था। इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है।
इस दिन घरों और मंदिरों में गोबर से गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। श्रद्धालु उसकी पूजा-अर्चना करते हैं और परिक्रमा लगाते हैं। इसके साथ ही गौ माता की पूजा करने की भी विशेष परंपरा है। मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवानों और व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, जिसे अन्नकूट कहा जाता है। कई मंदिरों में इस अवसर पर 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। इस दिन भक्त भगवान श्रीकृष्ण से परिवार की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करते हैं।
11 नवंबर: भाईदूज के साथ छह दिवसीय दीपोत्सव का समापन
छह दिनों तक चलने वाले दीपोत्सव का अंतिम पर्व भाईदूज 11 नवंबर को मनाया जाएगा। इसे यम द्वितीया के नाम से भी जाना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्रेम, स्नेह और अटूट पारिवारिक रिश्ते का प्रतीक है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को घर आमंत्रित करती हैं, उनके माथे पर तिलक लगाती हैं और उनकी लंबी उम्र तथा सुखी जीवन की कामना करती हैं। भाई भी बहनों को उपहार देकर उनके प्रति अपना स्नेह प्रकट करते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन यमुना जी ने अपने भाई यमराज को घर आमंत्रित कर भोजन कराया था। बहन के आतिथ्य और स्नेह से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान दिया था। इसी परंपरा के चलते भाईदूज पर बहनें अपने भाइयों को तिलक लगाकर उनके कल्याण की प्रार्थना करती हैं। इस पर्व के अवसर पर भाई-बहन एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं और अपने रिश्ते को और मजबूत बनाते हैं।
भाईदूज के दिन भगवान चित्रगुप्त की पूजा तथा कलम-दवात की आराधना का भी विशेष महत्व माना जाता है। विशेष रूप से कायस्थ समाज में इस दिन चित्रगुप्त पूजन की परंपरा निभाई जाती है। इस प्रकार भाईदूज के साथ ही वर्ष 2026 के छह दिवसीय दीपोत्सव का विधिवत समापन हो जाएगा।
डिस्क्लेमर: इस समाचार में दी गई धार्मिक तिथियां, पूजा के समय और शुभ मुहूर्त पंचांग तथा प्रचलित धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। अलग-अलग शहरों और क्षेत्रों के पंचांग के अनुसार तिथियों एवं पूजा के समय में अंतर संभव है। इसलिए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या शुभ कार्य से पहले स्थानीय पंचांग अथवा संबंधित विद्वान से जानकारी प्राप्त करना उचित रहेगा।








