हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। हर साल आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इसे कोजागरी पूर्णिमा, रास पूर्णिमा, कौमुदी व्रत और कुमार पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं से परिपूर्ण होकर चमकता है। ऐसी मान्यता है कि इस रात चंद्रमा की किरणों में अमृत के समान गुण होते हैं। इसी वजह से शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने की परंपरा निभाई जाती है। इस वर्ष शरद पूर्णिमा 25 अक्टूबर को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 55 मिनट पर शुरू होगी और 26 अक्टूबर को सुबह 9 बजकर 41 मिनट पर समाप्त होगी। उदया तिथि के बजाय रात्रि में पूर्णिमा के महत्व को देखते हुए इस पर्व का मुख्य उत्सव 25 अक्टूबर की रात को मनाया जाएगा।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में गोपियों के साथ महारास रचाया था। इस महारास को भगवान श्रीकृष्ण और गोपियों के बीच दिव्य प्रेम, भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि वैष्णव परंपरा में भी इस पूर्णिमा का विशेष महत्व है। श्रद्धालु इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना करते हैं और उनके प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं। मान्यता है कि शरद पूर्णिमा की चांदनी रात आध्यात्मिक साधना और भक्ति के लिए विशेष मानी जाती है।
शरद पूर्णिमा को लेकर एक अन्य धार्मिक मान्यता माता लक्ष्मी से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि इस रात मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और यह देखती हैं कि कौन जागकर उनकी आराधना कर रहा है। ऐसी मान्यता है कि जो भक्त पूरी रात जागकर माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं, उन पर देवी की विशेष कृपा बनी रहती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। इसी वजह से इस पर्व को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। ‘कोजागरी’ शब्द का संबंध ‘कौन जाग रहा है’ की मान्यता से जोड़ा जाता है। इस अवसर पर श्रद्धालु माता लक्ष्मी की पूजा करके परिवार की खुशहाली, धन-धान्य और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
शरद पूर्णिमा की रात खीर बनाने और उसे खुले आसमान के नीचे रखने की परंपरा भी काफी प्रचलित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गाय के दूध और चावल से बनी खीर को रात में ऐसे स्थान पर रखा जाता है, जहां चंद्रमा की रोशनी सीधे उस पर पड़ सके। माना जाता है कि चंद्रमा की किरणों के संपर्क में आने से खीर में विशेष गुण आ जाते हैं। इसके बाद अगले दिन सुबह इस खीर को प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों और अन्य लोगों में बांटा जाता है। कई घरों में इस परंपरा को श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाया जाता है। हालांकि, चंद्रमा की किरणों से खीर में औषधीय गुण आने की बात धार्मिक मान्यता का हिस्सा है, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं।
शरद पूर्णिमा के दिन माता लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना करने का भी विधान है। श्रद्धालु देवी की प्रतिमा या तस्वीर के सामने घी के दीपक जलाते हैं और विधि-विधान से पूजा करते हैं। कई लोग रातभर जागकर माता लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण के मंत्रों का जाप करते हैं। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि आती है। पूजा के दौरान फूल, फल, मिठाई और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। कुछ परंपराओं में माता लक्ष्मी की स्वर्णमयी प्रतिमा की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शरद पूर्णिमा के अवसर पर दान-पुण्य करना भी शुभ माना जाता है। इस दिन सफेद वस्त्र, चावल, चीनी, चांदी के बर्तन और भोजन का दान करने की परंपरा है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंद लोगों की सहायता करते हैं और पुण्य प्राप्ति की कामना करते हैं। इस तरह शरद पूर्णिमा केवल चंद्रमा की पूजा या खीर बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भक्ति, दान, सेवा और परिवार की खुशहाली से जुड़ा पर्व भी है। इस दिन श्रद्धालु माता लक्ष्मी और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करके सुख-समृद्धि, शांति और मंगलमय जीवन की कामना करते हैं।








