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October 18, 2026 2:09 pm

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SIR में इतने नाम क्यों कटे? 13 करोड़ वोटरों की छंटनी और 70 लाख नामों का रहस्य, सुरजीत भल्ला ने समझाया गणित

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देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर बहस तेज हो गई है। चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया के दौरान करीब 13.37 करोड़ नाम मसौदा मतदाता सूचियों से हटाए जाने के आंकड़े ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर कई सवाल खड़े किए हैं। इस बीच अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने अपने विश्लेषण में हटाए गए नामों की संख्या और वास्तव में गलत तरीके से सूची से बाहर हुए पात्र मतदाताओं के बीच अंतर समझाने की कोशिश की है। उनके अनुमान के मुताबिक, जिन राज्यों में SIR के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी हो चुकी है, वहां करीब 70 लाख पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने की वजह स्पष्ट नहीं हो पाई है। हालांकि, यह उनका आकलन है, चुनाव आयोग का आधिकारिक आंकड़ा नहीं।

13 करोड़ नाम हटने का पूरा गणित क्या है?

SIR के दौरान मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने की प्रक्रिया को लेकर सबसे बड़ी चर्चा 13 करोड़ से अधिक नामों के आंकड़े पर हो रही है। लेकिन सुरजीत भल्ला का कहना है कि इस पूरी संख्या को गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं की संख्या मान लेना सही नहीं होगा। हटाए गए नामों में मृत मतदाता, स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोग, एक से अधिक स्थानों पर दर्ज नाम और सत्यापन के दौरान नहीं मिल पाए मतदाता शामिल हैं।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न चरणों में मसौदा मतदाता सूचियों से कुल 13.37 करोड़ नाम हटाए गए। इनमें करीब 2.8 करोड़ मृत मतदाताओं के नाम, 6.3 करोड़ स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम, लगभग एक करोड़ डुप्लीकेट प्रविष्टियां और करीब तीन करोड़ ऐसे मतदाता शामिल बताए गए, जिनका सत्यापन नहीं हो पाया। ये आंकड़े बताते हैं कि नाम हटाए जाने के पीछे अलग-अलग कारण थे। इसलिए पूरी संख्या को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं है।

सुरजीत भल्ला ने 70 लाख का आंकड़ा कैसे निकाला?

अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने अपने विश्लेषण में देश की वयस्क आबादी, जन्म और मृत्यु से जुड़े आधिकारिक आंकड़ों तथा SIR से पहले मतदाता सूची में दर्ज लोगों की संख्या को आधार बनाया। उनका उद्देश्य यह अनुमान लगाना था कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों में कितने ऐसे पात्र मतदाता हो सकते हैं, जिनका नाम सूची में बने रहना चाहिए था।

भल्ला के अनुमान के मुताबिक, 2026 के मध्य में भारत की वयस्क आबादी लगभग 100.8 करोड़ थी। उन्होंने यह भी ध्यान में रखा कि देश के सभी वयस्क नागरिक मतदाता के रूप में पंजीकृत नहीं होते। उनके आकलन में करीब 8.5 प्रतिशत वयस्कों के मतदाता सूची में पंजीकृत नहीं होने की संभावना को शामिल किया गया।

इन अनुमानों के आधार पर उन्होंने देश में एक व्यवस्थित मतदाता सूची का संभावित आकार करीब 92.2 करोड़ आंका। इसके बाद उन नौ बड़े राज्यों के आंकड़ों का विश्लेषण किया, जहां SIR के बाद अंतिम मतदाता सूचियां जारी हो चुकी थीं। उनके मुताबिक, इन राज्यों में अनुमानित मतदाता संख्या और अंतिम सूची में दर्ज नामों के बीच लगभग 73 लाख का अंतर था। कुछ अन्य समायोजन करने के बाद उन्होंने करीब 70 लाख पात्र मतदाताओं के नामों का ऐसा अंतर निकाला, जिसकी वजह उनके विश्लेषण में स्पष्ट नहीं हो सकी।

यह समझना जरूरी है कि 70 लाख का आंकड़ा किसी आधिकारिक जांच में गलत तरीके से हटाए गए नामों की पुष्टि नहीं करता। यह उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर लगाया गया अनुमान है।

क्या SIR में हटाए गए सभी नाम गलत थे?

इस सवाल पर भल्ला ने कुल हटाए गए नामों और संभावित गलत बहिष्करण के बीच अंतर करने पर जोर दिया है। उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो चुकी है, वह स्थायी रूप से दूसरी जगह चला गया है या उसका नाम एक से अधिक स्थानों पर दर्ज है, तो मतदाता सूची में सुधार की जरूरत हो सकती है।

लेकिन दूसरी ओर, यदि कोई पात्र मतदाता अपने पते पर मौजूद होने के बावजूद प्रशासनिक त्रुटि, दस्तावेजों की समस्या या सत्यापन में गड़बड़ी के कारण सूची से बाहर हो जाता है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। खासकर गरीब परिवारों, प्रवासी मजदूरों, बुजुर्गों और उन लोगों के लिए यह प्रक्रिया मुश्किल हो सकती है, जिनके पास जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

यही कारण है कि SIR पर बहस केवल हटाए गए नामों की कुल संख्या तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि हटाए गए नामों में कितने लोग वास्तव में अपात्र थे और कितने पात्र मतदाताओं को दोबारा सूची में शामिल किए जाने की जरूरत है।

पश्चिम बंगाल में सामने आया बड़ा अंतर

सुरजीत भल्ला के विश्लेषण में पश्चिम बंगाल का मामला विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताया गया है। उनके अनुमान के अनुसार, राज्य में करीब 50 लाख पात्र मतदाताओं के नाम ऐसे हो सकते हैं, जिनके हटाए जाने की वजह स्पष्ट नहीं है। उन्होंने इस संभावित संख्या को लेकर अनिश्चितता भी स्वीकार की है।

उनके आकलन में पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में पहले लगभग 7.66 करोड़ नाम दर्ज थे, जो घटकर करीब 6.77 करोड़ रह गए। भल्ला के अनुमान के मुताबिक, राज्य की आबादी और पंजीकरण के संभावित आंकड़ों को देखते हुए अंतिम सूची में अपेक्षा से कम नाम रह गए हैं।

हालांकि, इस अंतर को सीधे गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं की प्रमाणित संख्या नहीं माना जा सकता। इसके लिए प्रत्येक मामले का सत्यापन और संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड देखना जरूरी है। पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद और पात्र मतदाताओं की शिकायतें भी सामने आई हैं।

बिहार में क्या है स्थिति?

बिहार के मामले में भल्ला का आकलन पश्चिम बंगाल से अलग है। उनके मुताबिक, राज्य की अंतिम मतदाता सूची में अनुमानित स्वच्छ सूची की तुलना में करीब 60 लाख अधिक नाम हो सकते हैं। उन्होंने इसकी एक संभावित वजह प्रवासी मजदूरों को बताया, जो रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रहते हैं, लेकिन उनका नाम बिहार की मतदाता सूची में दर्ज रहता है।

यह उदाहरण बताता है कि अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची की समस्याएं एक जैसी नहीं हैं। कहीं नामों के दोहराव या पुराने रिकॉर्ड का मुद्दा हो सकता है, तो कहीं पात्र मतदाताओं के नाम छूटने की आशंका सामने आ सकती है। इसलिए राष्ट्रीय स्तर के आंकड़ों के साथ राज्यवार स्थिति को समझना भी जरूरी है।

SIR पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना और उसमें मौजूद गलत या दोहराई गई प्रविष्टियों को हटाना है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नाम हटने के बाद प्रक्रिया की पारदर्शिता, सत्यापन के तरीके और शिकायतों के निपटारे को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि जिन लोगों के नाम हट गए हैं, उन्हें अपनी पात्रता साबित करने और मतदाता सूची में नाम दोबारा जुड़वाने के लिए प्रक्रिया का पालन करना पड़ सकता है। ऐसे में यह जरूरी है कि पात्र मतदाताओं को स्पष्ट जानकारी मिले, शिकायतों का समय पर समाधान हो और किसी भी व्यक्ति का मतदान का अधिकार केवल प्रशासनिक गलती के कारण प्रभावित न हो।

सुरजीत भल्ला ने भी अपने विश्लेषण में यह नहीं कहा कि जिन 70 लाख नामों का अंतर सामने आया है, वे सभी निश्चित रूप से गलत तरीके से हटाए गए हैं। उनका आकलन उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है और इसमें अनिश्चितता बनी हुई है।

आगे क्या होगा?

SIR को लेकर जारी बहस में अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि मतदाता सूची से बाहर हुए पात्र लोगों की पहचान कैसे होगी और उनकी शिकायतों का निपटारा किस तरह किया जाएगा। कुल 13.37 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा प्रक्रिया के व्यापक स्तर को दिखाता है, जबकि 70 लाख का अनुमान यह सवाल उठाता है कि पात्र मतदाताओं के संभावित नुकसान का आकलन किस आधार पर किया जाना चाहिए।

सुरजीत भल्ला का विश्लेषण इस बहस को एक अलग नजरिए से देखने की कोशिश करता है। उनके मुताबिक, मतदाता सूची में सुधार की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी पात्र मतदाता का नाम छूटने की आशंका को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

अंततः, मतदाता सूची की शुद्धता और प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की सुरक्षा, दोनों महत्वपूर्ण हैं। SIR की सफलता का आकलन केवल हटाए गए नामों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से भी होना चाहिए कि गलत प्रविष्टियां हटाने के साथ पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने और गलतियों को सुधारने की व्यवस्था कितनी प्रभावी रही।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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