पटना। बिहार की राजनीति और अपराध जगत से जुड़ा डॉक्टर के अपहरण का एक चर्चित मामला लंबे समय तक सुर्खियों में रहा। इस मामले में जाने-माने न्यूरोसर्जन डॉ. रमेश चंद्र का अपहरण किया गया था। घटना के बाद पुलिस की कार्रवाई, फिरौती की मांग और राजनीतिक गलियारों में मची हलचल ने पूरे मामले को चर्चा का विषय बना दिया था। इस केस में तत्कालीन जेडीयू विधायक सुनील पांडेय का नाम भी सामने आया था। हालांकि, मामले की कानूनी प्रक्रिया में बाद में महत्वपूर्ण बदलाव हुए।
2003 में हुआ था न्यूरोसर्जन डॉ. रमेश चंद्र का अपहरण
यह मामला 17 मई 2003 का है। उस समय पटना में जाने-माने न्यूरोसर्जन डॉ. रमेश चंद्र का अपहरण कर लिया गया था। रिपोर्टों के अनुसार, डॉक्टर को सर्पेंटाइन रोड पर पंचमंदिर के पास से अगवा किया गया था। उस समय वह एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद अपने घर लौट रहे थे।
आरोप था कि अपहरणकर्ताओं ने डॉक्टर को अगवा करने के बाद उनकी रिहाई के बदले 50 लाख रुपये की फिरौती मांगी थी। घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की और डॉक्टर की तलाश में कार्रवाई की।
इस घटना ने बिहार में कानून-व्यवस्था और उस दौर में अपराधियों के प्रभाव को लेकर बहस छेड़ दी थी।
पुलिस ने चार दिन बाद डॉक्टर को सुरक्षित छुड़ाया
डॉ. रमेश चंद्र के अपहरण के बाद पुलिस ने मामले की जांच तेज की। रिपोर्टों के मुताबिक, 21 मई 2003 को डॉक्टर को पटना के नजदीक नौबतपुर थाना क्षेत्र के चिरौरा गांव से सुरक्षित बरामद कर लिया गया था।
पुलिस की कार्रवाई के दौरान कई लोगों के नाम सामने आए और मामले में गिरफ्तारियां हुईं। जांच के आधार पर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। अदालत में मामले से जुड़े साक्ष्यों और गवाहियों के आधार पर सुनवाई हुई।
यह मामला इसलिए भी चर्चा में रहा क्योंकि इसमें डॉक्टर के अपहरण के साथ फिरौती की मांग और राजनीतिक प्रभाव रखने वाले लोगों की कथित भूमिका जैसे गंभीर पहलू जुड़े थे।
सुनील पांडेय को 2008 में सुनाई गई थी उम्रकैद
इस मामले में तत्कालीन जेडीयू विधायक सुनील पांडेय और अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चला। 17 सितंबर 2008 को पटना की एक निचली अदालत ने सुनील पांडेय समेत पांच आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने प्रत्येक दोषी पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
मामले में अपहरण, साझा आपराधिक मंशा और आपराधिक साजिश से संबंधित धाराएं लगाई गई थीं। निचली अदालत के फैसले के बाद आरोपियों ने उच्च न्यायालय में अपील की।
पटना हाईकोर्ट ने बाद में बदला फैसला
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि निचली अदालत के फैसले के बाद कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी। जुलाई 2010 में पटना हाईकोर्ट ने सुनील पांडेय समेत पांच आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि दो अन्य आरोपियों की अपील खारिज कर दी गई थी।
इसलिए इस मामले का उल्लेख करते समय यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सुनील पांडेय को निचली अदालत ने 2008 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी, लेकिन बाद में हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था। यानी केवल निचली अदालत की सजा का जिक्र करना मामले की पूरी कानूनी स्थिति को नहीं दर्शाता।
लालू यादव का नाम क्यों चर्चा में आया?
इस खबर की हेडलाइन में लालू यादव का जिक्र राजनीतिक संदर्भ के तौर पर किया गया है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि डॉक्टर के अपहरण के कारण लालू यादव व्यक्तिगत रूप से चिंतित थे या इस मामले में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका थी।
बिहार की राजनीति में अपराध और कानून-व्यवस्था का मुद्दा अलग-अलग दौर में राजनीतिक बहस का हिस्सा रहा है। ऐसे मामलों को समझते समय राजनीतिक आरोपों, मीडिया में किए गए दावों और अदालत के फैसलों के बीच अंतर रखना जरूरी है।
बिहार के चर्चित अपहरण मामलों में क्यों याद किया जाता है यह केस?
डॉ. रमेश चंद्र अपहरण मामला उस दौर की चर्चित घटनाओं में शामिल रहा, जब फिरौती के लिए अपहरण बिहार की कानून-व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा था। इस केस में डॉक्टर की सुरक्षित बरामदगी, कई आरोपियों के खिलाफ मुकदमा और अलग-अलग अदालतों के फैसले लंबे समय तक चर्चा में रहे।
निष्कर्ष: डॉ. रमेश चंद्र का अपहरण 2003 में हुआ था और उन्हें चार दिन बाद सुरक्षित बरामद कर लिया गया था। इस मामले में सुनील पांडेय को 2008 में निचली अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन 2010 में पटना हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। इसलिए मामले की पूरी कहानी बताते समय दोनों अदालतों के फैसलों का उल्लेख करना जरूरी है।








