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September 2, 2026 5:42 pm

नेपाल ने भारत-चीन-अमेरिका से मांगा मुआवजा! कहा- जलवायु संकट हमने नहीं बनाया, कीमत हम क्यों चुकाएं?

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नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब मामला राहत और बचाव से आगे बढ़कर क्लाइमेट जस्टिस यानी जलवायु न्याय तक पहुंच गया है। नेपाल ने दुनिया के बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में शामिल भारत, चीन और अमेरिका से जलवायु से हुए नुकसान के लिए मुआवजे की मांग उठाई है। नेपाल का कहना है कि उसके ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग और तेजी से पिघलते ग्लेशियरों का खामियाजा उसे भारी तबाही के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

‘यह दान नहीं, नैतिक जिम्मेदारी है’

नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि बाढ़ के बाद मिलने वाली सहायता को केवल चैरिटी या दान के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। नेपाल इसे ‘मोरल लायबिलिटी’ यानी नैतिक जिम्मेदारी के रूप में देखता है। उन्होंने कहा कि नेपाल अब अपनी कूटनीतिक रणनीति को सिर्फ सहायता मांगने से आगे बढ़ाकर न्याय और मुआवजे की दिशा में ले जा रहा है।

नेपाल का तर्क है कि वैश्विक जलवायु संकट में उसका योगदान नगण्य होने के बावजूद हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने और चरम मौसम की घटनाओं का असर उस पर disproportionately यानी अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा पड़ रहा है।

भारत, चीन और अमेरिका का नाम क्यों?

नेपाल ने भारत, चीन और अमेरिका को दुनिया के प्रमुख ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में गिनाते हुए कहा है कि ऐतिहासिक उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर देशों को होने वाले नुकसान की भरपाई की जिम्मेदारी बड़े उत्सर्जकों को भी उठानी चाहिए। हालांकि, यह नेपाल का राजनयिक और जलवायु-न्याय संबंधी दावा है; इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि हाल की बाढ़ सीधे तौर पर किसी एक देश के उत्सर्जन के कारण हुई।

UN के Loss and Damage Fund का भी सहारा

नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र समर्थित Fund for Responding to Loss and Damage से भी तत्काल वित्तीय सहायता की मांग की है। यह व्यवस्था जलवायु परिवर्तन से प्रभावित कमजोर देशों को उन नुकसान और क्षति से निपटने में मदद करने के लिए बनाई गई है, जिन्हें केवल अनुकूलन उपायों से टालना मुश्किल होता है।

नेपाल की कोशिश है कि हाल की तबाही को इसी व्यापक जलवायु नुकसान के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाया जाए।

बाढ़ ने नेपाल को दिया बड़ा झटका

26 अगस्त को भोटेकोशी नदी क्षेत्र में आई भीषण बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों को प्रभावित किया। रिपोर्टों के मुताबिक, आपदा में 1,100 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग अभी भी लापता हैं। बड़े पैमाने पर सड़क, पुल, बिजली और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को नुकसान पहुंचा है।

इस आपदा ने नेपाल के लिए आर्थिक और मानवीय संकट को और गहरा कर दिया है। देश को अब राहत के साथ-साथ लंबे समय तक चलने वाले पुनर्निर्माण की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

क्या जलवायु परिवर्तन बना बाढ़ का कारण?

विशेषज्ञों के मुताबिक हिमालय तेजी से गर्म हो रहा है और ग्लेशियरों के पिघलने तथा ग्लेशियल अस्थिरता से अचानक आने वाली बाढ़ और अन्य आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है। हाल की नेपाल त्रासदी में ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के खिसकने से अचानक पानी का तेज बहाव पैदा होने की बात सामने आई है।

हालांकि किसी एक प्राकृतिक आपदा को सीधे किसी एक देश के उत्सर्जन से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से बेहद जटिल है। जलवायु परिवर्तन को इस तरह की घटनाओं के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में से एक माना जा रहा है।

अब आगे क्या?

नेपाल का यह कदम आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय जलवायु राजनीति में महत्वपूर्ण बहस को जन्म दे सकता है। एक तरफ नेपाल जैसे कम-उत्सर्जन वाले देश जलवायु आपदाओं का बढ़ता बोझ उठाने की बात कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ बड़े उत्सर्जक देशों के लिए यह सवाल अहम है कि जलवायु नुकसान की जिम्मेदारी किस आधार पर और किस तंत्र के जरिए तय की जाए।

फिलहाल नेपाल ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है—उसे केवल राहत या दान नहीं, बल्कि जलवायु नुकसान के लिए न्याय और मुआवजे की व्यवस्था चाहिए।

Rashmi Repoter
Author: Rashmi Repoter

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