नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र से भी ग्लेशियरों को लेकर चिंताजनक खबर सामने आई है। टिहरी गढ़वाल की भिलंगना घाटी में ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने और बर्फीले द्रव्यमान में कमी का वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। शोध के मुताबिक, खतलिंग ग्लेशियर 1973 से 2024 के बीच करीब 5.33 किलोमीटर पीछे खिसक चुका है।
1970 के दशक से लगातार पीछे हट रहा खतलिंग
स्प्रिंगर के Regional Environmental Change जर्नल में 28 अगस्त 2026 को प्रकाशित अध्ययन में भिलंगना घाटी के छह प्रमुख ग्लेशियरों—खतलिंग, फेटिंग, दूधगंगा, रतंगरियां, जोगिन और एक अनाम ग्लेशियर—का 1973 से 2025 तक अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट तस्वीरों और डिजिटल एलिवेशन मॉडल के जरिए ग्लेशियरों के क्षेत्रफल, ऊंचाई, बर्फीले द्रव्यमान और अग्रिम हिस्से में हुए बदलावों का आकलन किया।
अध्ययन के अनुसार, खतलिंग ग्लेशियर का अग्रिम सिरा करीब 5.33±0.04 किलोमीटर पीछे खिसका। इस दौरान इसका ग्लेशियर क्षेत्रफल भी लगभग 2.79 वर्ग किलोमीटर कम हुआ, जो अध्ययन किए गए ग्लेशियरों में सबसे बड़ा क्षेत्रीय नुकसान था।
ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ी
शोध में यह भी सामने आया कि भिलंगना घाटी में ग्लेशियरों का द्रव्यमान कम होने की गति समय के साथ तेज हुई है। खासतौर पर 2014-2025 के दौरान खतलिंग और अनाम ग्लेशियर में पहले की तुलना में बर्फ के नुकसान की दर लगभग चार से पांच गुना तक बढ़ी। वैज्ञानिकों ने इसे हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों पर बढ़ते जलवायु दबाव के व्यापक संकेतों से जोड़ा है।
खतलिंग ग्लेशियर भिलंगना नदी के जलग्रहण क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह घाटी भागीरथी नदी की प्रमुख सहायक नदी भिलंगना से जुड़ी है और इसका पानी आगे चलकर टिहरी जलाशय तथा निचले क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
ग्लेशियर झील का बढ़ता आकार भी चिंता
अध्ययन में एक अनाम ग्लेशियर के सामने बनी झील को भी संभावित खतरे के लिहाज से महत्वपूर्ण बताया गया है। इस झील का क्षेत्रफल 2011 में करीब 0.23 वर्ग किलोमीटर से बढ़कर 2024 में लगभग 0.36 वर्ग किलोमीटर हो गया। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि ऐसी बढ़ती ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी जरूरी है, क्योंकि इनके अस्थिर होने पर ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF का खतरा पैदा हो सकता है।
हालांकि, खतलिंग ग्लेशियर के 5.33 किलोमीटर पीछे हटने का मतलब यह नहीं है कि उत्तराखंड में तत्काल बाढ़ आने वाली है। यह लंबे समय में ग्लेशियरों के बदलते स्वरूप और संभावित क्रायोस्फेरिक जोखिमों का संकेत है। किसी विशेष बाढ़ की भविष्यवाणी के लिए झील के जलस्तर, मौसम, हिमस्खलन, बांध जैसी प्राकृतिक संरचनाओं और स्थानीय परिस्थितियों की अलग-अलग निगरानी जरूरी होती है।
नेपाल की बाढ़ के बीच क्यों बढ़ी चिंता?
नेपाल में हालिया बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र में हुई आपदाओं ने एक बार फिर ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों की निगरानी को चर्चा में ला दिया है। उत्तराखंड भी भौगोलिक रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में आता है, जहां भारी बारिश, ग्लेशियरों में बदलाव और अचानक जलप्रवाह जैसी घटनाएं कई जगह जोखिम बढ़ा सकती हैं।
वैज्ञानिक अध्ययन का मुख्य संदेश तत्काल बाढ़ की चेतावनी से ज्यादा लगातार निगरानी और बेहतर आपदा तैयारी पर जोर देता है। शोधकर्ताओं ने उच्च-रिजॉल्यूशन रिमोट सेंसिंग, ड्रोन सर्वे और जमीनी स्तर पर निगरानी को मजबूत करने की जरूरत बताई है।
आगे क्या चुनौती?
भिलंगना घाटी में ग्लेशियरों के पीछे हटने और पतले होने की प्रक्रिया आने वाले वर्षों में जल संसाधनों तथा आपदा जोखिम दोनों को प्रभावित कर सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियरों के तेजी से पीछे हटने से शुरुआती दौर में पिघले पानी की मात्रा बढ़ सकती है, लेकिन लंबे समय में ग्लेशियरों के छोटे होने से सूखे मौसम में पानी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
इसलिए खतलिंग ग्लेशियर का 5.33 किलोमीटर पीछे हटना हिमालय में तेजी से हो रहे ग्लेशियर बदलाव का महत्वपूर्ण संकेत है। फिलहाल सबसे जरूरी कदम संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की नियमित निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना और स्थानीय प्रशासन को संभावित आपदाओं के लिए तैयार रखना है।








