नई दिल्ली। हाल ही में जारी की गई NASA की सैटेलाइट तस्वीरों और जलवायु विश्लेषण में यह संकेत मिला है कि प्रशांत महासागर में असामान्य रूप से बढ़ता समुद्री तापमान, जिसे वैज्ञानिक ‘गॉडजिला एल नीनो’ जैसे मजबूत एल नीनो इवेंट के रूप में देख रहे हैं, वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित कर रहा है। इसका सीधा असर भारत के मानसून पर भी पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ गया है। इसी वजह से वायुमंडलीय दबाव में बदलाव हो रहा है, जिसका असर हवा के पैटर्न और बारिश के वितरण पर पड़ता है। NASA के अनुसार, यह स्थिति दक्षिण एशिया के मानसून सिस्टम को कमजोर कर सकती है।
भारत पर क्या होगा असर?
मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि एल नीनो की मजबूत स्थिति भारत में मानसून की गति को धीमा कर सकती है। इसके चलते कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम हो सकती है, जिससे सूखे जैसी स्थिति बनने का खतरा बढ़ जाता है। खासकर कृषि पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि भारत में खेती काफी हद तक मानसून की बारिश पर निर्भर करती है।
मानसून पैटर्न में बदलाव की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि एल नीनो के दौरान अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से उठने वाली नमी वाली हवाओं का संतुलन बिगड़ जाता है। इससे कुछ इलाकों में भारी बारिश और कुछ क्षेत्रों में बिल्कुल कम बारिश हो सकती है। इस असमान वितरण से बाढ़ और सूखे दोनों तरह की स्थितियां एक साथ उत्पन्न हो सकती हैं।
NASA की चेतावनी
NASA की जलवायु इकाई ने कहा है कि महासागरों के बढ़ते तापमान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्लोबल वार्मिंग के चलते ऐसे घटनाक्रम और अधिक तीव्र और बार-बार हो सकते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे जलवायु परिवर्तन का स्पष्ट संकेत बताया है।
किसानों और अर्थव्यवस्था पर असर
अगर मानसून कमजोर रहता है, तो खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का और दलहन की पैदावार पर असर पड़ सकता है। इससे खाद्य कीमतों में वृद्धि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव बनने की संभावना रहती है।
निष्कर्ष
NASA की यह चेतावनी संकेत देती है कि वैश्विक जलवायु परिवर्तन का असर अब स्थानीय मौसम प्रणालियों पर भी साफ दिखने लगा है। ‘गॉडजिला’ एल नीनो जैसी घटनाएं आने वाले समय में भारत सहित कई देशों के लिए मौसम संबंधी बड़ी चुनौती बन सकती हैं।








