भारत में बढ़ते इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) की समस्या के बीच सरकार की ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत एक महत्वपूर्ण प्रगति सामने आई है। देश अब ई-वेस्ट मैनेजमेंट और रीसाइक्लिंग के क्षेत्र में तेजी से मजबूत हो रहा है, जिसे पर्यावरण संरक्षण और सस्टेनेबल विकास की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
बढ़ता ई-वेस्ट बना बड़ी चुनौती
पिछले कुछ वर्षों में भारत में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उपयोग में भारी बढ़ोतरी हुई है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ई-वेस्ट की मात्रा भी तेजी से बढ़ी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कचरा यदि सही तरीके से न निपटाया जाए तो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है।
इसी चुनौती को देखते हुए देश में ई-वेस्ट प्रबंधन प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
‘मेक इन इंडिया’ से मिला नया समाधान
‘मेक इन इंडिया’ अभियान के तहत अब देश में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के निर्माण के साथ-साथ उनके सुरक्षित निपटान और रीसाइक्लिंग पर भी जोर दिया जा रहा है। सरकार और निजी कंपनियों के सहयोग से ई-वेस्ट को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस करने के लिए नई तकनीकों और यूनिट्स का विकास किया जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि “यूज़ एंड रीसायकल” मॉडल को मजबूत करना भी है, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सके।
रीसाइक्लिंग सेक्टर को मिल रहा बढ़ावा
ई-वेस्ट रीसाइक्लिंग के जरिए पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान से कीमती धातुएं जैसे सोना, तांबा और चांदी भी निकाली जा सकती हैं। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान कम होता है, बल्कि आर्थिक अवसर भी बढ़ते हैं।
देश में अब कई आधुनिक रीसाइक्लिंग प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं, जहां तकनीक की मदद से ई-कचरे का सुरक्षित निपटान किया जा रहा है।
रोजगार और अर्थव्यवस्था को भी फायदा
ई-वेस्ट मैनेजमेंट सेक्टर अब रोजगार का एक नया क्षेत्र बनकर उभर रहा है। कलेक्शन, प्रोसेसिंग, रीसाइक्लिंग और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा हो रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह सेक्टर भारत की ग्रीन इकॉनमी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
सरकार की सख्त नीतियां
सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली कंपनियों के लिए एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) नियम लागू किए हैं, जिसके तहत कंपनियों को अपने उत्पादों के कचरे के निपटान की जिम्मेदारी भी निभानी होती है। इससे ई-वेस्ट मैनेजमेंट को व्यवस्थित करने में मदद मिल रही है।
निष्कर्ष
‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत ई-वेस्ट समाधान की दिशा में भारत का यह कदम न केवल पर्यावरण संरक्षण की ओर एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह देश को आत्मनिर्भर और सस्टेनेबल विकास की दिशा में भी आगे बढ़ा रहा है। आने वाले समय में यह प्रयास भारत को ई-वेस्ट मैनेजमेंट के क्षेत्र में एक वैश्विक मॉडल बना सकता है।








