देशभर में आयोजित NEET परीक्षा के दौरान कई परीक्षा केंद्रों पर भावुक कर देने वाले दृश्य देखने को मिले। कुछ छात्र-छात्राएं केवल 1 मिनट की देरी के कारण परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं कर पाए, जिससे उनका पूरा सालों का सपना पलभर में टूटता नजर आया। गेट के बाहर ही खड़े कई अभ्यर्थी फूट-फूटकर रोते दिखाई दिए, जबकि उनके माता-पिता उन्हें संभालने की कोशिश करते रहे।
परीक्षा केंद्रों पर सख्त नियमों का असर
NEET जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में इस बार प्रवेश को लेकर बेहद सख्ती बरती गई। निर्धारित समय के बाद पहुंचने वाले किसी भी छात्र को अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई। कई जगहों पर केवल एक मिनट की देरी भी भारी पड़ गई और छात्रों को गेट से ही लौटा दिया गया।
अभ्यर्थियों का कहना है कि ट्रैफिक, दूरी और तकनीकी कारणों से वे थोड़ी देर से पहुंचे, लेकिन उन्हें किसी तरह की छूट नहीं दी गई।
गेट के बाहर भावुक नजारा
परीक्षा केंद्रों के बाहर का माहौल बेहद भावुक था। कई छात्राएं गेट के बाहर ही बैठकर रोने लगीं। कुछ अभिभावक अपने बच्चों को समझाने की कोशिश करते रहे, लेकिन निराशा और टूटे हुए सपने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, कई छात्र अपने एडमिट कार्ड और दस्तावेज लेकर गेट पर अधिकारियों से गुहार लगाते रहे, लेकिन नियमों का हवाला देकर उन्हें प्रवेश से मना कर दिया गया।
छात्रों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया
कुछ छात्रों ने कहा कि वे महीनों से इस परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, लेकिन केवल कुछ मिनट की देरी ने उनका पूरा प्रयास बेकार कर दिया। वहीं अभिभावकों ने प्रशासन से अपील की कि ऐसी स्थितियों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
कई माता-पिता ने यह भी कहा कि परीक्षा केंद्रों की दूरी, ट्रैफिक और अन्य कारणों को देखते हुए कुछ लचीलापन होना चाहिए, ताकि छात्रों का भविष्य प्रभावित न हो।
नियमों को लेकर फिर उठा सवाल
इस घटना के बाद एक बार फिर परीक्षा प्रणाली और नियमों की सख्ती को लेकर बहस शुरू हो गई है। कुछ लोगों का मानना है कि अनुशासन बनाए रखने के लिए नियम जरूरी हैं, लेकिन वहीं कई लोग इसे छात्रों के भविष्य के साथ कठोरता बता रहे हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि राष्ट्रीय परीक्षाओं में पारदर्शिता और अनुशासन आवश्यक है, लेकिन मानवीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
निष्कर्ष
NEET परीक्षा के दौरान गेट पर छूटे छात्रों का यह दृश्य केवल एक परीक्षा का मामला नहीं, बल्कि उन सपनों का प्रतीक है जो कुछ पलों की देरी में टूट गए। यह घटना एक बार फिर इस बात पर चर्चा छेड़ गई है कि क्या परीक्षा नियमों में सख्ती के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता की भी जगह होनी चाहिए।








