मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच हुआ हालिया युद्धविराम (सीजफायर) अब नए संकट में फंसता दिख रहा है। जहां एक ओर अमेरिका और ईरान कूटनीतिक समाधान की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं, वहीं इजरायल की जारी सैन्य कार्रवाई ने पूरे समझौते को कमजोर कर दिया है।
हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्तों के अस्थायी सीजफायर पर सहमति बनी थी, जिसका उद्देश्य युद्ध को रोककर बातचीत के लिए रास्ता तैयार करना था। इस समझौते में खाड़ी क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज को फिर से खोलने और तनाव कम करने पर जोर दिया गया था।
लेकिन स्थिति तब जटिल हो गई जब इजरायल ने लेबनान में ईरान समर्थित संगठन हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अपने हमले जारी रखे। इजरायल का साफ कहना है कि उसका अभियान सीजफायर का हिस्सा नहीं है और वह अपनी सुरक्षा के लिए कार्रवाई जारी रखेगा।
इसी बीच ईरान ने अमेरिका को कड़ा संदेश दिया है। ईरान का कहना है कि अमेरिका एक साथ दो नीतियां नहीं अपना सकता—एक तरफ सीजफायर की बात और दूसरी तरफ इजरायल के जरिए युद्ध जारी रखना। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर इजरायल के हमले नहीं रुके, तो वह सीजफायर से पीछे हट सकता है और बातचीत भी टूट सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद सीजफायर की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरा है। दरअसल, अमेरिका इस समझौते को सीमित दायरे में देख रहा है, जबकि ईरान चाहता है कि इसमें इजरायल की सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो। यही अलग-अलग व्याख्याएं अब तनाव का कारण बन रही हैं।
इसके अलावा, परमाणु कार्यक्रम, मिसाइल नीति और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे बड़े मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे, जबकि ईरान अपने अधिकारों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस सीजफायर का स्वागत किया गया है। यूरोपीय देशों ने इसे “तनाव कम करने का अवसर” बताया है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है।
फिलहाल, यह साफ है कि यह सीजफायर बेहद नाजुक स्थिति में है। एक तरफ बातचीत की कोशिशें जारी हैं, तो दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा।
आने वाले दिनों में यह तय होगा कि अमेरिका किस दिशा में आगे बढ़ता है—क्या वह पूरी तरह शांति की राह चुनता है या इजरायल के साथ खड़े होकर संघर्ष को जारी रखता है। यही फैसला मध्य पूर्व की स्थिरता और वैश्विक राजनीति दोनों पर बड़ा असर डालेगा।







