टोंक जिले की पीपलू तहसील के ग्राम नवरंगपुरा में एक गरीब अनुसूचित जाति (दलित) परिवार के साथ लंबे समय से अन्याय हो रहा है। वर्ष 1975 में बद्री लाल बैरवा के परिवार को ग्राम नवरंगपुरा में खसरा नंबर 45 (वर्तमान में 88/3) में 5 बीघा 6 बीसवा भूमि का आवंटन किया गया था। लेकिन अधिकारियों की लापरवाही और मनमानी के कारण इस भूमि पर प्रभावशाली लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है और यह अभी भी गैर-खातेदारी में दर्ज है।
बद्री लाल बैरवा ने बताया कि उन्होंने मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री, शासन सचिव (राजस्व विभाग), कृषि मंत्री, जन अभियोग निराकरण समिति, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग, अनुसूचित जाति कल्याण समिति (राजस्थान विधानसभा) सहित कई उच्च अधिकारियों को बार-बार निवेदन दिए, लेकिन कोई राहत नहीं मिली।
विभिन्न स्तरों से कई आदेश जारी हो चुके हैं:
- राजस्व मंत्री द्वारा 12 नवंबर 2025 (कार्यालय डायरी स.2389)
- जन अभियोग निराकरण समिति द्वारा 12 मई 2023 (आदेश क्रमांक अ/जअनिस/2023/42.36)
- जन अभाव अभियोग निराकरण मंत्री द्वारा 28 मार्च 2024 (प्र.शा. पत्रांक)
- राजस्व मंडल अजमेर द्वारा आदेश (राम/भू.अ./भू.सु./शिका/ प-32/2023)
- राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग द्वारा शिकायत (ES D.W/BP/RJ/2025/302416)
- उपमुख्यमंत्री प्रेमचंद बैरवा द्वारा 1 मार्च 2024 (पत्र क्रमांक उ.मु.म/वि.स./2024/2144)
- अनुसूचित जाति कल्याण समिति द्वारा 10 दिसंबर 2025 (पत्रांक एफ 35(15)अजा/वी.स/2025-26/37484)
इन सभी के बावजूद जिला स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। बद्री लाल बैरवा ने मुख्य रूप से पीपलू तहसीलदार पर आरोप लगाया कि खातेदारी मांगने पर उन्होंने गलत तरीके से 14(4) के तहत आवंटन निरस्त करने की कार्रवाई की, जो अवैध है। अतिरिक्त जिला कलेक्टर मालपुरा ने 5 फरवरी 2025 को प्रकरण स. 2/2022 में फैसला उनके पक्ष में सुनाया।
तहसीलदार ने अतिक्रमणियों के खिलाफ 183-बी का प्रकरण उनके नाम से दर्ज किया, जो गलत है। राजस्व विभाग के परिपत्र (प 15(9)राज-6/2000, दिनांक 8 दिसंबर 2000) के अनुसार अनुसूचित जाति की भूमि पर अवैध कब्जा हटाने की जिम्मेदारी तहसीलदार की है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
बद्री लाल बैरवा ने कहा कि 50 साल बीत गए, लेकिन न्याय नहीं मिला। गरीब परिवार की आजीविका प्रभावित है और प्रशासन आदेशों को अनदेखा कर रहा है। अब देखना है कि कब तक यह अन्याय जारी रहेगा और कब मिलेगा इस दलित किसान परिवार को उनका हक।






