देश में महिलाओं का औसत वेतन पुरुषों से लगभग 25% कम है, जबकि पिछले 12 वर्षों (2012 से 2024 तक) में नौकरीपेशा लोगों का औसत वेतन नाममात्र में 90% बढ़ा है। हालांकि, महंगाई को जोड़ने पर वास्तविक (रियल) आय में करीब 4% की गिरावट आई है। यह जानकारी हालिया रिपोर्ट्स और सर्वे पर आधारित है, जैसे दैनिक भास्कर और अन्य आर्थिक विश्लेषणों से।
जेंडर पे गैप की स्थिति
देश में महिलाएं पुरुषों की तुलना में औसतन 25% कम कमाती हैं। यह अंतर कई क्षेत्रों में देखा गया है, खासकर जहां महिलाओं की भागीदारी कम है या अनुभव/पदोन्नति में भेदभाव होता है। पुरानी रिपोर्ट्स (जैसे 2017 की मॉन्स्टर इंडिया सर्वे) में भी यही आंकड़ा सामने आया था, जहां महिलाओं की प्रति घंटा कमाई पुरुषों से काफी पीछे थी। हालांकि, 2025 की कुछ नई ग्लोबल रिपोर्ट्स में संकेत मिला है कि भारत में जेंडर पे गैप तेजी से कम हो रहा है और कुछ सेक्टरों में पुरुष-महिला की औसत सैलरी अब लगभग बराबर (13,000 से 23,000 डॉलर सालाना) पहुंच गई है। फिर भी, समग्र स्तर पर 25% का गैप अभी भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
वेतन वृद्धि और महंगाई का असर
- 2012 से 2024 तक: औसत वेतनभोगी की मासिक आय नाममात्र में 90% बढ़ी।
- लेकिन महंगाई (इन्फ्लेशन) के कारण रियल वेतन में गिरावट आई है।
- औसतन, वेतनभोगी कर्मचारियों की वास्तविक खरीद क्षमता 4% कम हुई है।
- इसका मतलब है कि कागजी बढ़ोतरी के बावजूद जीवनयापन की लागत (खाना, किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि) इतनी तेजी से बढ़ी कि असली कमाई घट गई।
यह स्थिति कई रिपोर्ट्स में सामने आई है, जहां बताया गया कि भारत में वेतनभोगी रोजगार बढ़ रहा है (करीब 23% लोग संगठित नौकरियों में), लेकिन असली आय नहीं बढ़ पा रही। कई लोगों के लिए महंगाई “डायन” की तरह कमाई निगल रही है।
क्या बदलाव की उम्मीद?
सरकार और कंपनियां अब योग्यता, अनुभव और परफॉर्मेंस आधारित वेतन पर ज्यादा फोकस कर रही हैं, जिससे जेंडर गैप कम हो सकता है। लेकिन महंगाई को काबू में रखना और रियल वेज ग्रोथ सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती बनी हुई है।






