इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दिसंबर 2025 के अंत से जनवरी 2026 तक दूषित पेयजल (सीवेज मिश्रण से) के कारण फैले गंभीर डायरिया आउटब्रेक में अब तक 17 मौतें हो चुकी हैं। हजारों लोग प्रभावित हुए, और कुछ मामलों में हैजा जैसे बैक्टीरिया (Vibrio cholerae) की भी पुष्टि हुई है।
आपका प्रस्तावित प्रोटोकॉल अत्यंत व्यावहारिक और वैज्ञानिक रूप से मजबूत है। यह WHO, CDC और भारत के अपने जलजनित रोग नियंत्रण दिशानिर्देशों (जैसे IDSP – Integrated Disease Surveillance Programme) से पूरी तरह मेल खाता है। घनी आबादी वाले क्षेत्रों में ऐसे आउटब्रेक को रोकने के लिए युद्धस्तर (**war footing**) पर त्वरित कार्रवाई जरूरी होती है, और भागीरथपुरा में हुई देरी (लीकेज पता होने के बावजूद पाइपलाइन रिपेयर न होना, शिकायतों को अनदेखा करना) ने जानें लीं।
आपके सुझाए मुख्य बिंदुओं पर संक्षिप्त विश्लेषण और समर्थन
1.ज़ोनिंग एवं सोर्स कंट्रोल
बिल्कुल सही। जैसे ही 5+ संदिग्ध मामले सामने आएं, मुख्य पाइपलाइन कट-ऑफ, रेड ज़ोन घोषणा और टैंकर से क्लोरिनेटेड पानी सप्लाई अनिवार्य होनी चाहिए। भागीरथपुरा में लीकेज पुलिस चौकी के पास था, लेकिन देरी से लोग लगातार दूषित पानी पीते रहे।
2. एक्टिव केस फाइंडिंग एवं ट्राइएज
अस्पतालों का इंतज़ार न करके डोर-टू-डोर सर्विलांस (RRT के साथ आशा वर्कर्स) और घरों में ORS, जिंक, क्लोरीन टैबलेट्स वितरण जीवनरक्षक होता। साथ ही क्षेत्र में अस्थाई स्टेबलाइजेशन सेंटर (IV fluids के लिए) बनाना चाहिए था – एम्बुलेंस देरी से कई जानें गईं।
3. पॉइंट-ऑफ-यूज़ (POU) जल शुद्धिकरण
शॉक क्लोरिनेशन और रेसिड्यूअल क्लोरीन टेस्ट (0.5 mg/L मानक) हर 2 घंटे में जरूरी। पुराने पानी को फेंकवाना और बर्तन सैनिटाइज करवाना भी महत्वपूर्ण। यह बैक्टीरिया (E. coli, Klebsiella आदि) को तुरंत नियंत्रित करता।
4. एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग एवं सीवरेज इंटरवेंशन
क्रॉस-कंटेमिनेशन का मूल कारण। वैक्यूम सक्शन, डाई-ट्रेसर टेस्ट (लीकेज पता लगाने के लिए तेज़ और गैर-विनाशकारी) और कैल्शियम हाइपोक्लोराइड छिड़काव तत्काल जरूरी। भागीरथपुरा में पुरानी पाइपलाइन और सीवेज प्रेशर का इश्यू वर्षों से था।
5. वैज्ञानिक सूचना संप्रेषण
स्पष्ट चेतावनी (लाउडस्पीकर से “नल का पानी न पीएं”), लक्षण अलर्ट (rice-water stools) और अफवाह नियंत्रण जरूरी। भ्रम से लोग देर से इलाज करवाते हैं।
6. पोस्ट-डिजास्टर जीनोम सीक्वेंसिंग
पैथोजन स्ट्रेन (Vibrio cholerae या अन्य) की पहचान से भविष्य में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और सोर्स ट्रेसिंग संभव होती। यह प्रोटोकॉल को पूर्ण बनाता है।
व्हाइट पेपर का सार
आपका व्हाइट पेपर का सार सटीक है: यह त्रासदी प्रशासनिक लापरवाही और इंफ्रास्ट्रक्चर की पुरानी विफलता (अमृत योजना के बावजूद जर्जर पाइपलाइन) का परिणाम है। आधिकारिक मौतें 4-6 बताई गईं, लेकिन स्थानीय/मीडिया रिपोर्ट्स में 17 तक पहुंचीं – यह डेथ ऑडिट में छिपाव का संकेत है। प्रभावितों के नाम सार्वजनिक करना मानवाधिकार का मुद्दा उठाता है।
ऐसे प्रोटोकॉल को राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर SOP (Standard Operating Procedure) बनाना चाहिए, ताकि भविष्य में “स्वच्छ शहर” के नाम पर छिपी गंदगी से जानें न जाएं। यदि यह दस्तावेज़ सार्वजनिक/नीतिगत चर्चा के लिए है, तो यह बड़ा बदलाव ला सकता है।
यदि आप इसमें कोई और डिटेल जोड़ना या संशोधन चाहें, तो बताएं। यह बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है।






