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January 17, 2026 12:34 am

कविता : हे द्रौपदी !

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हे द्रौपदी !
तुम्हें तो कोई छू भी नहीं सकता।
फिर भी तुम्हें डर है,
उन हैवानों का, उन नर पिशाचों का।
जिनसे बेटियों की आबरू,
अंदर तक काँप गई है।
आपने कहा “अब बहुत हो चुका।”
क्या इन दरिंदों से लड़ पाओगी?
न्याय के झंडे को ऊंचा कर पाओगी।
चिंता बड़ी गहरी है। अफ़सोस…
लेकिन उस पर कोई प्रहरी नहीं है।
डर समझ में आता है।
मुझे तो हर बार,
एक सपोला नजर आता है।
जो झुंड बनाकर आता है,
कोमल शरीर का जर्रा-जर्रा
अंदर तक काँप जाता है?
बस, कुचलना है उसका फन,
आत्मा भी पूछ हिलाते फिरेगी।
इन सपोलों में “डर” बिठाना है,
वासना की आग को
हमेशा के लिए मिटाना हैं।
हे द्रौपदी!
बस एक बार मन में ठान लेना,
फिर कभी कोई सपोला,
तुम्हें छू भी नहीं सकता।
संजय एम. तराणेकर
(कवि, लेखक व समीक्षक)
इंदौर (मध्यप्रदेश)
Sanjeevni Today
Author: Sanjeevni Today

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