मशरूम पौष्टिकता के साथ ही देता है कम स्थान में अधिक फायदा

 


लखनऊ। मधुमेह रोगियों के लिए वरदान माना जाने वाला मशरूम स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होने के साथ ही छोटी दूरी में अधिक आमदनी का जरिया भी है। विटामिन सी व बी कांप्लेक्स ग्रुप से भरपूर मशरूम को एक छोटे से घर में भी आसानी से उगाया जा सकता है। वैसे तो इसकी सैकड़ों वेराइटी हैं लेकिन ठंड के मौसम में उगाने के लिए एगेरिकस बाइस्पीरस या एगेरिकस बाइटोरकस या सफेद बटन मशरूम उपयुक्त है। इसको उगाने के लिए विशेष प्रकार की कंपोस्ट की जरूरत होती है।

इस संबंध में उपनिदेशक उद्यान अनीस श्रीवास्तव ने बताया कि इसके लिए कंपोस्ट खाद बनाना उपयुक्त है। इसके लिए एक टन भूसा में 150 किग्रा गेहूं का चापड़, 18 किग्रा यूरिया, 35 किग्रा जिप्सम मिलाकर 25 दिन तक रख दें। इसके बाद कंपोस्ट तैयार हो जाने पर इसमें क्लोरोपायरीफास एक मिली दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर भूसे का पुन: ढेर बना दिया जाता है। इसके बाद 28वें दिन इसमें मशरूम का बीज मिला देना चाहिए। इसके बाद पालीथिन की थैलियों में इसे भर देते हैं। इसे भरने के बाद खाली घर में क्रमबद्धकर टांग देते हैं। इसे टांगने के कुछ दिनों के बाद ही मशरूम निकलना शुरू हो जाता है। उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार से बताया कि बटन मशरूम में लिए एस-11, यू-3, पंत-31 तथा एम.एस-39 किस्में अच्छी है।

उन्होंने कहा कि पालीथीन की थैलियों को अखबार से ढकने के बाद उसमें सुबह-शाम पानी का छिड़काव करते रहना चाहिए। मशरूम को लगाने के कुछ दिनों बाद यह निकलना शुरू होता है और 50-60 दिनों तक निकलता रहता है। इसके लिए कमरे का तापमान 20 डिग्री से कम होना चाहिए। मशरूम को रेफ्रीजरेटर में चार-छह दिनों तक पालीथीन में बंद करके रखा जा सकता है या फिर डिब्बाबंदी की जाती है।

अनीस श्रीवास्तव ने कहा कि ढिंगरी मशरूम के उत्पादन में 16 से 20 दिनों में भीगे हुए भूस का रंग दूधिया हो जाता है। कवक के कारण भूसा आपस में चिपक जाता है। इस स्थिति में थैलियों में भरे हुए भूसे को नमी देने के लिए पानी का छिड़काव करते रहना जरूरी है। इसकी उपज अधिक होने पर इसे सूखाकर भी बाजार में बेचा जा सकता है।

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