कोरोना : सूने पड़े हैं घाट, नहीं हैं सजी-धजी बैलगाड़ियां और हटिया मेले का रंग

 


रायबरेली। कोरोना के असर से आस्था और परम्परा भी प्रभावित हुई है। लोक आस्था का सबसे महत्वपूर्ण पर्व कार्तिक पूर्णिमा भी इस बार कोरोना की भेंट चढ़ गया। कार्तिक पूर्णिमा जिसे लोक में कतिकी भी कहा जाता है में इस बार सब कुछ सूना है। गंगा घाटों पर लगने वाले मेले, सजे हुए बैलगाड़ियों की खनकती आवाजें। घाटों पर लोगों का हुजूम और वहीं लगे मेले में खरीददारी, यह सब इस बार नहीं दिख रहा है।

गंगा स्नान के बाद हटिया मेले में लोगों की भीड़ इस बार नहीं है। कोरोना के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए प्रशासन ने इस बार कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले मेलों पर प्रतिबंध लगा दिया है। कार्तिक पूर्णिमा भारतीय परम्परा में लोक आस्था का पर्व है। इस दिन लोक संस्कृति और परम्परा के दर्शन जगह जगह हो जाते हैं। गंगा के घाटों पर जहां स्नान के लिए लोगों का हुजूम उमड़ता है। वहीं इस पर घाट पर बहुत कम लोग ही स्नान कर रहे हैं। घाटों पर तीर्थ पुरोहित भी इस बार उदास है। जिसका वह साल भर से इंतजार कर रहे थे।

रायबरेली में डलमऊ सबसे प्रमुख घाट है। जहां कार्तिक पूर्णिमा का मेला लगता है। यहां रायबरेली के अलावा अमेठी और सुल्तानपुर से भी श्रद्धालु आते हैं। अमूमन पांच लाख से ज्यादा की भीड़ यहां होती है। डलमऊ का प्रसिद्ध हटिया मेला जिसमें सजी धजी बैलगाड़ियां व बैलों और घोड़ों को सजाकर लाया जाता है, इसकी विशेष पहचान हैं।

बैलों पर बंधे घुंघुरूओं की आवाजें एक अलग ही सम्मोहन पैदा करती थीं। इन्हीं विशेषताओं के कारण सरकार ने इसे प्रांतीय मेला घोषित किया है, लेकिन इस बार सब सूना है। कोरोना के बढ़ते केस के कारण प्रशासन लगे प्रतिबंधों का कड़ाई से पालन करा रहा है।जगह जगह लगे बैरिकेटिंग से भारी वाहनों का आवागमन अवरुद्ध कर दिया गया है। घाट की ओर जाने वाले सभी रास्तों को बंद किया गया है। भारी संख्या में पुलिस बल की तैनाती की गई है। यही हाल गोकना, गेंगासो और अन्य महत्वपूर्ण गंगा घाटों का है।प्रशासन ने भी लोगों से स्नान के लिये घाट पर न आने की अपील की है। 

तीर्थ पुरोहितों के सामने रोज़ी का संकट
कोरोना के चलते पहले से ही प्रतिबंधों का सामना कर रहे तीर्थ पुरोहितों के सामने कार्तिक पूर्णिमा पर प्रतिबंध ने बड़ा संकट पैदा कर दिया है। इस दिन का वह बेसब्री से इंतजार कर रहे थे लेकिन सुने पड़े उनके तख्त कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। अब तो उनके सामने रोजी रोटी का संकट उत्पन्न हो गया है। 

उल्लेखनीय है कि तीर्थ पुरोहितों की कमाई का एकमात्र जरिया स्नान करने आने वाले श्रद्धालु ही हैं। गंगा गोकर्ण समिति के सचिव और तीर्थ पुरोहित पंडित जितेंद्र द्विवेदी कहते हैं कि यह विकट स्तिथी है। हम सभी को इस दिन का इंतजार रहता है लेकिन जिस तरह से अचानक प्रतिबंध लगाया गया है वह समझ के परे है। लॉकडाउन वाली स्तिथी इस समय गंगा घाटों पर है। उन्होंने सरकार से तीर्थ पुरोहितों के विषय में राहत देने की मांग की।

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