सामुदायिक भागीदारी से ही होगा नदियों का संरक्षण : अमिताभ कांत

 
सामुदायिक भागीदारी से ही होगा नदियों का संरक्षण : अमिताभ कांत


नई दिल्ली। नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने कहा है कि नदियों का संरक्षण सामुदायिक भागीदारी से ही संभव है। नदियों के संरक्षण में लोगों को जोड़ना जरूरी है। उन्होंने यह मत पांचवें भारत जल प्रभाव शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन शुक्रवार को व्यक्त किया। दूसरे दिन चर्चा 'रिवर कंजर्वेशन सिंक्रोनाइज्ड ह्यूमन सेटलमेंट' पर केंद्रित रही। इस दौरान कहा गया कि  मौजूदा समय में नदी क्षेत्रों में शहरों का विकास और विस्तार तेजी से हो रहा है, जिसके चलते आज नदियों पर जल निकासी के अतिरिक्त भार के अलावा उनके प्रदूषित होने का खतरा भी बढ़ रहा है। इसीलिए शहरी क्षेत्रों में इन मुद्दों को सुलझाए बिना नदियों का संरक्षण कार्य आसान नहीं होगा। शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों को एक मंच पर लाने के लिए 'नमामि गंगे' को धन्यवाद देते हुए कहा कि भारत में नदियां विशेष रूप से आस्था, आशा, संस्कृति और पवित्रता के साथ-साथ लाखों लोगों की आजीविका का स्रोत हैं।

उन्होंने कहा कि “हमारे लिए लोगों का अधिक संख्या में होना मायने नहीं रखता, ज़रूरी यह कि नदियों के संरक्षण कार्य से जुड़ने वाले लोगों में जुनून हो। जरूरी है कि इस पुनित कार्य में लोगों की सामुदायिक भागीदारी हो।" सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज के प्रधान संस्थापक प्रो. विनोद तारे ने कहा कि नदी संरक्षण और विकास एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के "वोकल फॉर लोकल" अभियान से प्रेरणा लेते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि स्थानीय जल निकायों का प्रबंधन और स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति स्थानीय लोगों द्वारा ही की जानी चाहिए। इससे स्थानीय रोजगार पैदा होगा और जल परिवहन की लागत कम होगी। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने कहा- "एनएमसीजी का विजन न केवल वर्तमान में नदी वाले शहरों में लोगों को नदियों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए काम करना है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करना है कि इन समस्याओं को दोहराया न जाए।" 

उन्होंने बताया कि आज देश में तेजी से हो रहे शहरीकरण को देखते हुए शहर के मास्टर प्लान में 'शहरी नदी योजना' और 'शहरी जल प्रबंधन योजना' को एकीकृत करने की दिशा में काम किया जा रहा है, ताकि इस नए मास्टर प्लान को संवेदनशील बनाया जा सके। नीदरलैंड के कीस बोन्स ने अपने अनुभव साझा करते हुए तीन बिन्दुओं टिकाऊ ग्रोथ, एकीकृत दृष्टिकोण तथा प्रकृति-आधारित समाधानों के प्रयोग पर जोर दिया। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष पांचवें भारत जल प्रभाव शिखर सम्मेलन का आयोजन नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा और सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडीज मिलकर कर रहे हैं। हालांकि, कोरोना संकट के चलते इस बार समिट को वर्चुअल तरीके से आयोजित किया जा रहा है। 15 दिसम्बर तक चलने वाली यह 5वीं इंडिया वाटर इम्पैक्ट समिट, भारत की कुछ सबसे बड़ी जल संबंधी समस्याओं पर चर्चा करने और इसके समाधान के लिए उपयुक्त मॉडल विकसित करने के लिए सभी हितधारकों को एक साथ एक मंच पर लेकर लाएगी।

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