आर्थिक रूप से सक्षम परिवार मदरसों की बजाय कॉनवेन्ट स्कूलों को दे रहे तरजीह

 


गोरखपुर। उप्र की योगी सरकार में कई क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन देखने को मिल रहा है। इस सरकार में अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र अब मदरसा शिक्षा के बजाय आधुनिक और तकनीकी शिक्षा की ओर रुख कर रहे हैं। विगत तीन वर्षों में मदरसा बोर्ड की परीक्षा में शामिल छात्रों की संख्या में कमी आयी है।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर व आस पास के क्षेत्रों में अल्पसंख्यक समुदाय मुसलिम वर्ग की संख्या अच्छीखासी है। उसके बाद भी जनपद के मदरसों में विगत कुछ वर्षों में छात्रों की संख्या में कमी आयी है। गोरखपुर के अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी आशुतोष पांडेय ने बताया कि मदरसों में कोरोना वायरस संक्रमण के कारण देश में चल रहे लॉकडाउन के बाद छात्रों को वर्चुअल कक्षाओं के माध्यम से शिक्षित किया जा रहा है। मदरसों में भी तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया जा रहा है। अल्पसंख्यक वर्ग के लिए सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाओं का शीघ्रता से क्रियान्वन किया जा रहा है।

सरकार की वर्तमान योजना पर प्रकाश ड़ालते हुए उन्होंने कहा कि सरकार की छात्रवृति योजना के अंतर्गत अल्पसंख्य्क वर्ग के छात्रों को कक्षा एक से लेकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने तक छात्रवृति दी जा रही है। लेकिन यह सिर्फ उन विद्यालयों या संस्थान के अल्पसंख्यक छात्रों को मिलेगा जो नेशनल स्कालर पोर्टल पर पंजीकृत होंगे। अभी तक गोरखपुर में 500 से अधिक संस्थानों का पोर्टल पर रजिस्ट्रेशन किया जा चुका है। बताया कि लगभग 600 संस्थान प्रक्रिया के अंतर्गत है।

अल्पसंख्यक अधिकारी ने बताया कि जनपद में कुल 286 मदरसे हैं जिनमें 10 सरकार द्वारा सहायता प्राप्त हैं, जबकि 276 निजी हैं। एडेड मदरसों में 2500 छात्र हैं जबकि निजी मदरसों में लगभग 25000 छात्र हैं। उन्होंने बताया कि पिछले तीन वर्षों में मदरसा बोर्ड की परीक्षा में शामिल होने वाले छात्रों की संख्या में कमी आयी है। 

मदरसा अंजुमन इस्लामिया खुनीपुर् गोरखपुर के प्रधानाचार्य रफ़ीउल बेग ने बताया कि इधर छात्रों की संख्या में कमी आयी है। कमी का कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि मदरसों में अपने बच्चों को कौन पढ़ाना चाहता है। सभी कॉनवेन्ट स्कूलों को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। जबकि मदरसों में उर्दू और अरबी के साथ हिंदी,अंग्रेजी गणित सहित कई विषयों की आधुनिक शिक्षा भी दी जा रही है। उसके बाद भी मदरसों में बच्चोंं को लाने के लिए मशक्कत करनी पड़ती है।

उन्होंने बताया कि अधिकांश गरीब वर्ग के बच्चे हैं जिनके अभिभावक यह सोचते हैं कि इनको पढ़ाने की बजाय मजदूरी ही कराई जाए। मानदेय पर रखे शिक्षकों को सही समय पर मानदेय न मिलने से भी उनमें निराशा है। हालांकि धीरे-धीरे बदलाव की हवा वहां भी बहने लगी है। अब मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे भी स्मार्ट फोन चलाते हैं। वहां कंप्यूटर आ गए हैं और कई जगह पर अंग्रेजी भी पढ़ाई जा रही है। लेकिन यह भी सच है कि मदरसे की शिक्षा से नौकरी पाना वाकई मुश्किल हैं। शायद ही किसी सरकारी नौकरी में ये योग्यता काम आती हो। सभी जगह इसकी डिग्री भी मान्य नहीं है, ऐसे में समय के साथ चलना ज़रूरी हो गया है।

उन्होंने बताया कि अब हर मुस्लिम परिवार चाहता है कि उसके बच्चे आधुनिक शिक्षा ले जो रोजगारपरक हो और वे अपनी जिंदगी में कुछ काम कर सके। आम मुसलमान धार्मिक शिक्षा के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उसकी प्राथमिकता अब मौजूदा वक्त में बदल गई है। उसे समझ में आ गया है कि नौकरी आधुनिक शिक्षा से ही मिलेगी।

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में दो तरह के मदरसे चलते हैं। पहले वे जो उत्तर प्रदेश सरकार के मदरसा शिक्षा बोर्ड से मान्यता प्राप्त हैं। इनके छात्रों, अध्यापकों और पाठ्यक्रम पर सरकार की नजर रहती है। इसके अलावा इनकी परीक्षा भी मानक के अनुरूप होती है। सरकार ने इन मदरसों में एनसीआरटी का पाठ्यक्रम लागू करवा दिया है।

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