चिदंबरम ने जमानत के नियमों को लेकर न्यायिक असमानता का उठाया मुद्दा, पूछा- सिद्दीक कप्पन और मुनव्वर फारुकी को क्यों नहीं मिल रही जमानत?

 


नई दिल्ली। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बावजूद लोगों को विभिन्न सोच रखने पर गिरफ्तार किया जाना तथा जमानत नहीं दिए जाने पर वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने न्यायालय के फैसलों पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने पत्रकार सिद्दीक कप्पन और कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी को अदालत से जमानत नहीं मिलने को लेकर न्यायिक असमानता का भी मुद्दा उठाया है। उन्होंने पूछा कि अक्सर न्यायिक समानता की बात होती है, इसके बावजूद लोगों को कानूनी सिद्धांतों के समान अनुप्रयोग से वंचित क्यों रखा जाता है?

पी. चिदंबरम ने गुरुवार को ट्वीट कर न्यायालय के फैसलों और जमानत संबंधी नियमों पर सवाल उठाया। उन्होंने ट्वीट कर सवाल किया कि आखिर पत्रकार सिद्दीक कप्पन और कॉमेडियन मुनव्वर फारुकी को अदालत जमानत क्यों नहीं दे रही है? जब समानता का अर्थ न्याय तक समान पहुंच और कानूनी सिद्धांतों के समान अनुप्रयोग हैं, तो फिर किसी एक को राहत और दूसरे को सिर्फ इंतजार क्यों मिल रहा है।

कांग्रेस नेता ने एक अन्य ट्वीट में संविधान पीठ (न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट) और एक अन्य खंडपीठ (न्यायमूर्ति चंद्रचूड़) के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि 'जमानत के लिए नियम और जेल के लिए अपवाद' का सिद्धांत हर मामले में लागू क्यों नहीं होता है?

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस नेता ने जिस केस में न्यायमूर्ति रवींद्र भट्ट की टिप्पणी का जिक्र किया है, उसमें 03 अक्टूबर,2019 को सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी (अत्याचार निवारण) संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। न्यायमूर्ति एस. रवींद्र भट्ट ने अलग आदेश जारी कर कहा था कि गिरफ्तारी से पहले जमानत केवल असाधारण स्थितियों में दी जानी चाहिए, जहां जमानत से इनकार करना न्याय का गर्भपात होगा।

उधऱ, अर्नब गोस्वामी केस में जस्टिस चंद्रचूड़ ने टिप्पणी की थी कि "हमारा लोकतंत्र असाधारण रूप से मजबूत और लचीला है। सरकारों को ट्वीट्स को अनदेखा करना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। यह वह आधार नहीं है, जिस पर चुनाव लड़ा जाता है।" उन्होंने आगे कहा था, "अगर आपको कोई चैनल पसंद नहीं है तो उसे न देखें। किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अस्वीकार करने के लिए तकनीकी आधार नहीं हो सकता। यह आतंकवाद का मामला नहीं है।"

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